
Trump Iran Strategy: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान में हुई शांति वार्ता भले किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंची, लेकिन इसने एक नई बहस जरूर छेड़ दी है, क्या अमेरिका बिना किसी औपचारिक समझौते के ही इस टकराव से बाहर निकलने की तैयारी कर रहा है? वॉशिंगटन से आ रहे संकेत इसी ओर इशारा कर रहे हैं। हालात यह बताते हैं कि शुरुआती आक्रामक रुख के बाद अब अमेरिका की रणनीति में बदलाव दिख रहा है, और इसके केंद्र में हैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप।
ब्रिटिश मैगजीन The Economist की रिपोर्ट के मुताबिक, जंग की शुरुआत में ट्रंप को भरोसा था कि सैन्य कार्रवाई से वे अपने लक्ष्य हासिल कर लेंगे। लेकिन अब उन्हें यह एहसास हो गया है कि इस रास्ते में फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो सकता है। यही वजह है कि अब अमेरिका सीधे टकराव से थोड़ा पीछे हटता नजर आ रहा है।
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इस्लामाबाद में हुई बातचीत से पहले ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी थी। उन्होंने साफ कहा था कि अगर समझौता नहीं हुआ तो “तेहरान को बड़ा दर्द दिया जाएगा”। लेकिन जब बातचीत फेल हो गई, तब भी अमेरिका ने कोई सैन्य हमला नहीं किया। इसके उलट, अमेरिका ने अपनी रणनीति बदलते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास दबाव बनाने की कोशिश शुरू कर दी।
अमेरिका ने संकेत दिया कि इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर कड़ी कार्रवाई हो सकती है। यह कदम दिखाता है कि अब सीधी जंग की बजाय आर्थिक और रणनीतिक दबाव की नीति अपनाई जा रही है।
मामले की सबसे बड़ी पेचीदगी यही है कि ईरान झुकने को तैयार नहीं है।
ऐसे में 2015 जैसे समझौते की वापसी फिलहाल मुश्किल दिख रही है। ट्रंप के लिए भी यह राजनीतिक चुनौती बन सकता है, क्योंकि कमजोर समझौता उनकी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर मिडिल ईस्ट के दूसरे देशों पर भी दिख रहा है। सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान के करीब 13 हजार सैनिकों को तैनात किया है। वहीं कुवैत, यूएई और कतर भी अपने-अपने स्तर पर सुरक्षा तैयारियों में जुट गए हैं। इन देशों को डर है कि अमेरिका अचानक पीछे हट सकता है, इसलिए वे खुद को सुरक्षित करने में लगे हैं।
अमेरिकी अखबार The Washington Post के अनुसार, अगर यह टकराव आगे बढ़ता है तो जमीन पर सैनिक उतारने की नौबत आ सकती है। यह वह स्थिति है, जिससे ट्रंप फिलहाल बचना चाहते हैं। जमीन पर युद्ध का मतलब है, लंबी लड़ाई, ज्यादा खर्च और भारी नुकसान।
अब तक के घटनाक्रम से जो तस्वीर बन रही है, उसमें अमेरिका सीधे युद्ध से दूरी बनाकर दबाव की राजनीति करना चाहता है।
यानी, बिना औपचारिक समझौते के भी “जंग से बाहर निकलने” का रास्ता तैयार किया जा रहा है।
मिडिल ईस्ट का यह संकट अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन अमेरिका के रुख में बदलाव साफ दिख रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब जल्दबाजी में कोई बड़ा कदम उठाने के मूड में नहीं दिखते।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिका सच में बिना समझौते के इस टकराव से बाहर निकलता है या फिर हालात एक बार फिर से नई दिशा लेते हैं।
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