
Umar Khalid News: दिल्ली दंगा मामले में सितंबर 2020 से जेल में बंद छात्र नेता और एक्टिविस्ट उमर खालिद ने लगभग छह साल बाद अपना पहला इंटरव्यू दिया है। उन्होंने जेल में बिताए समय के मानसिक प्रभाव, अपने खिलाफ लगे आरोपों, देश के राजनीतिक माहौल और अपनी नई जमानत याचिका सहित कई मुद्दों पर बात की। 'द गार्डियन' को दिए गए इंटरव्यू में उमर खालिद ने कहा कि लंबे समय तक बिना ट्रायल जेल में रहने से उनके मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत जीवन पर गहरा असर पड़ा है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (BJP) का कहना है कि भारत की न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र है और उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई राजनीति से प्रेरित नहीं है।
उमर खालिद ने बताया कि लंबे समय तक जेल में रहने का असर सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी गहरा रहा। उन्होंने कहा कि जेल में कई बार उनके साथ रहने वाले कैदी भी उन्हें लेकर बनी सार्वजनिक छवि के आधार पर उन्हें "आतंकवादी" कहकर संबोधित करते थे। खालिद के मुताबिक, इस तरह की धारणा उनकी इंसानियत को प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि कई बार ऐसा महसूस होता है कि लोगों की नजर में उनकी पहचान सिर्फ एक आरोप तक सीमित होकर रह गई है।
खालिद ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की पहचान केवल एक सकारात्मक या नकारात्मक छवि तक सीमित हो जाती है, तो उसके लिए अपनी व्यक्तिगत पहचान और मानसिक संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि जो लोग उनके प्रति सहानुभूति रखते हैं, वे भी कई बार यह भूल जाते हैं कि वह भी एक सामान्य इंसान हैं, जिनमें डर, कमजोरियां और कमियां हैं। उनके अनुसार, जेल में बिताए वर्षों ने उनके मन और शरीर दोनों पर असर डाला है और उनकी मानसिक चिंताओं को बढ़ाया है।
उमर खालिद को सितंबर 2020 में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप लगाया गया कि वह 2020 के दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश के प्रमुख आरोपियों में शामिल थे और हिंसक तरीके से सत्ता परिवर्तन की साजिश रची गई थी। खालिद ने इन सभी आरोपों से लगातार इनकार किया है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि भारत की न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र है और इस मामले की कानूनी कार्रवाई राजनीति से प्रेरित नहीं है।
उमर खालिद ने कहा कि जेल में रहने के बावजूद देश के मौजूदा राजनीतिक माहौल को लेकर उनकी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्होंने समाज में नफरत फैलाने वाले भाषणों और गलत जानकारी के बढ़ते प्रसार पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि उनके अनुसार भारत में "पोस्ट-ट्रुथ" यानी ऐसी स्थिति, जहां तथ्यों की तुलना में भावनाओं और गलत सूचनाओं का अधिक प्रभाव हो, तेजी से बढ़ी है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के पूर्व छात्र नेता ने विपक्षी दलों, सिविल सोसाइटी और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि छह साल जेल में रहने के बाद उन्हें निराशा महसूस होती है और कई बार वह खुद को अकेला भी महसूस करते हैं। उनका कहना था कि विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई के मामलों में राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की चुप्पी सरकार को और अधिक कार्रवाई करने का हौसला देती है।
उमर खालिद ने कहा कि लंबे समय तक जेल में रहने के बावजूद उन्होंने अपने विचार नहीं बदले हैं। उन्होंने 2019 के नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए गए अपने संदेश को दोहराते हुए कहा कि वह हिंसा का जवाब हिंसा से और नफरत का जवाब नफरत से देने में विश्वास नहीं रखते। उनके अनुसार, यदि समाज में नफरत फैलाई जाती है, तो उसका जवाब प्रेम और शांति से दिया जाना चाहिए।
कुछ सप्ताह पहले दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली दंगा मामले में उमर खालिद की नई जमानत याचिका पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया था। कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) सुमेध कुमार सेठी ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 4 जुलाई की तारीख तय की है।
अपनी नई जमानत याचिका में उमर खालिद ने हालात में बदलाव का हवाला दिया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ द्वारा 18 मई को दिए गए एक फैसले का उल्लेख किया है। यह फैसला NIA की जांच वाले एक नार्को-टेरर मामले में जम्मू-कश्मीर निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देने से जुड़ा था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष 5 जनवरी के एक फैसले में अपनाई गई तर्क-प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने कहा था कि उस फैसले में Union of India vs K.A. Najeeb (2021) मामले में तीन जजों की पीठ द्वारा तय किए गए महत्वपूर्ण सिद्धांतों को सही तरीके से लागू नहीं किया गया। उस फैसले में यह माना गया था कि यदि किसी आरोपी का ट्रायल लंबे समय तक शुरू नहीं होता और वह लंबे समय से जेल में है, तो UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत पर लगी कानूनी पाबंदियों के बावजूद राहत दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने उस निर्देश पर भी आपत्ति जताई थी, जिसमें कहा गया था कि उमर खालिद और शरजील इमाम अपनी जमानत याचिका पर दोबारा तभी सुनवाई की मांग कर सकते हैं, जब सुरक्षित गवाहों (Protected Witnesses) से पूछताछ पूरी हो जाए या एक वर्ष बीत जाए। कोर्ट ने इस निर्देश पर भी सवाल उठाए थे।
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