
UN World Map Resolution: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में हाल ही में एक दिलचस्प प्रस्ताव पास हुआ। मकसद बेहद सीधा है-दुनिया के नक्शे को थोड़ा और सटीक बनाया जाए। अब तक जिस 'मर्केटर प्रोजेक्शन' के आधार पर हम नक्शे देखते आए हैं, उसमें कई महाद्वीपों और देशों का आकार वास्तविक क्षेत्रफल से काफी अलग दिखाई देता है। मसलन, अफ्रीका जैसे महाद्वीप असल में जितने बड़े हैं, नक्शे में उतने दिखते नहीं। इसी कमी को दूर करने के लिए 'इक्वल-एरिया मैप प्रोजेक्शन' का प्रस्ताव लाया गया, जिसे 164-1 के भारी बहुमत से मंजूरी मिल गई। छह देश मतदान से दूर रहे। भारत ने भी इस प्रस्ताव के पक्ष में खुलकर वोट दिया। लेकिन नई दिल्ली ने साथ ही अपनी स्थिति साफ कर दी कि उसके समर्थन को किसी एक खास विश्व मानचित्र या मैप प्रोजेक्शन की मंजूरी नहीं माना जाना चाहिए।
दुनिया में लंबे समय से इस्तेमाल होने वाले Mercator Projection में भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों का आकार वास्तविकता से काफी बड़ा दिखाई देता है। इसका असर खास तौर पर अफ्रीका और दूसरे equatorial regions के प्रतिनिधित्व पर पड़ता है। UN के नए प्रस्ताव का मकसद ऐसे distortion को कम करना और Equal-Area Map Projection के इस्तेमाल पर ज्यादा विचार करना है। इसमें महाद्वीपों के आपसी क्षेत्रफल का अनुपात अपेक्षाकृत सही बना रहता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया में इस्तेमाल होने वाला हर पुराना नक्शा अब तुरंत बदल जाएगा। UN का प्रस्ताव किसी एक projection को अनिवार्य नहीं करता, बल्कि देशों, संस्थानों, स्कूलों और दूसरे उपयोगकर्ताओं को जरूरत के हिसाब से बेहतर विकल्पों पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
भारत ने प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन उसकी वजह किसी खास नक्शे को मंजूरी देना नहीं थी। भारत ने कहा कि वह Equal-Area Map Projections के व्यापक इस्तेमाल और उन पर विचार किए जाने के मूल सिद्धांत का समर्थन करता है। संयुक्त राष्ट्र में भारत की ओर से First Secretary रघू पुरी ने कहा कि प्रस्ताव को किसी एक विशेष projection के समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत का मानना है कि Equal-Area तरीके अलग-अलग क्षेत्रों के वास्तविक सापेक्ष आकार को समझने में मदद कर सकते हैं। भारत ने यह भी कहा कि अलग-अलग देशों, शैक्षणिक संस्थानों और map makers को अपनी जरूरत के हिसाब से projection चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। नई दिल्ली ने इस पूरे मामले में तकनीकी और पद्धतिगत तटस्थता बनाए रखने पर जोर दिया।
सरल भाषा में समझें तो Equal-Area Projection का मकसद नक्शे पर अलग-अलग जमीन के हिस्सों के वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात को ज्यादा सही बनाए रखना है। इसके उलट Mercator Projection मूल रूप से navigation के लिए तैयार किया गया था। यह दिशा और समुद्री मार्गों के लिए उपयोगी रहा, लेकिन इसमें ध्रुवों की ओर जाने वाले इलाकों का आकार काफी बढ़ा हुआ दिखाई दे सकता है। इसी वजह से दुनिया के वास्तविक landmass को समझने के लिए दूसरे projection भी इस्तेमाल किए जाते हैं।
जैसे ही भारत ने वोट दिया, कई तरह के सवाल उठने लगे। लेकिन विदेश मंत्रालय (MEA) ने तुरंत तस्वीर साफ कर दी। MEA के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल और भारतीय राजनयिक रघु पुरी ने साफ लहजे में कहा कि भारत का समर्थन सिर्फ एक वैज्ञानिक और तकनीकी सिद्धांत को है, जिसे 'इक्वल-एरिया प्रोजेक्शन' कहते हैं। इसका मतलब कतई यह नहीं है कि भारत ने यूएन के किसी बने-बनाये नक्शे या किसी खास मॉडल (जैसे इक्वल अर्थ मॉडल) को आंख मूंदकर मान लिया है। भारत ने जोर देकर कहा कि हर देश, स्कूल और मैपिंग एजेंसी को अपनी जरूरत के हिसाब से प्रोजेक्शन चुनने की पूरी आजादी होनी चाहिए।
प्रस्ताव का समर्थन करने के साथ ही भारत ने एक सख्त और सीधी लाइन खींच दी। विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया कि नक्शा दिखाने का तरीका चाहे जो भी हो, भारत की सीमाओं और संप्रभुता के साथ कोई खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होगा। केंद्र-शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अटूट और अभिन्न हिस्से हैं। विदेश मंत्रालय ने चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि इन इलाकों का कोई भी गलत, विवादित या गुमराह करने वाला चित्रण किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा। उन्हें सिर्फ भारत के आधिकारिक नक्शे के हिसाब से ही दिखाया जाना चाहिए।
कई लोगों को लग सकता है कि इस प्रस्ताव से अंतरराष्ट्रीय सीमाएं या राजनीतिक विवाद सुलझ जाएंगे, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, यह प्रस्ताव विशुद्ध रूप से भौगोलिक क्षेत्रफल को सही अनुपात में दिखाने के लिए है। इसका अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, विवादित इलाकों या जगहों के नामों जैसे राजनीतिक विषयों से कोई लेना-देना नहीं है। भारत का रुख एकदम स्पष्ट और गैर-परक्राम्य (non-negotiable) है-तकनीकी सुधारों का स्वागत है, लेकिन जहां बात देश की क्षेत्रीय अखंडता की आएगी, वहां कोई समझौता नहीं होगा।
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