
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से आई यह खबर सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज की संवेदनाओं को झकझोर देने वाली त्रासदी है। जिस पिता के कंधों पर बेटी की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है, उसी ने भरोसे का गला घोंट दिया। अदालत ने इसे जघन्य अपराध मानते हुए दोषी को कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह फैसला कानून की सख्ती और न्याय व्यवस्था की तत्परता, दोनों का संकेत देता है।
मामला सोनभद्र जिले के चोपन थाना क्षेत्र का है। शिकायत के अनुसार, मार्च 2025 में पीड़िता की मां का निधन हो गया था। इसके बाद 15 वर्षीय किशोरी अपने दो भाइयों और पिता के साथ रह रही थी। आरोप है कि मां की मौत के अगले ही महीने पिता ने अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म किया, जिससे वह गर्भवती हो गई। पीड़िता के मामा ने पिछले साल अक्टूबर में पुलिस को तहरीर दी। उन्होंने बताया कि गर्भ ठहरने के कारण बच्ची के शरीर में बदलाव आने लगे थे। सातवें महीने में पेट उभरने पर चाची को शक हुआ। पूछताछ में किशोरी ने पूरी आपबीती बताई। इसके बाद परिजन उसे लेकर थाने पहुंचे।
चोपन पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल पॉक्सो एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पीड़िता का मेडिकल परीक्षण कराया गया और डीएनए जांच कराई गई। जांच में यह स्पष्ट हो गया कि जन्मी बच्ची आरोपी की ही संतान है। पुलिस ने आवश्यक साक्ष्यों के साथ अदालत में चार्जशीट दाखिल की। इस मामले की सुनवाई विशेष पॉक्सो कोर्ट में हुई।
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विशेष पॉक्सो कोर्ट के न्यायाधीश अमित वीर सिंह ने मामले को जघन्य करार देते हुए आरोपी को कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही डेढ़ लाख रुपये का अर्थदंड लगाया गया है, जिसमें से 1 लाख 20 हजार रुपये पीड़िता को दिए जाएंगे। महज 35 दिनों की सुनवाई में फैसला आना यह दर्शाता है कि न्यायालय ने मामले को प्राथमिकता देते हुए त्वरित न्याय सुनिश्चित किया।
मामले के सामने आने के बाद किशोरी को बाल कल्याण समिति (CWC) की निगरानी में रखा गया। परिजनों ने गर्भपात की अनुमति मांगी, लेकिन अदालत ने इसकी इजाजत नहीं दी। 13 जनवरी को जिला अस्पताल में किशोरी ने एक बच्ची को जन्म दिया। अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि यह निर्णय केवल एक व्यक्ति को दंडित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को स्पष्ट संदेश देने के लिए है कि नाबालिगों के साथ यौन अपराध किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।
यह मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस सामाजिक सच्चाई का आईना है जहां कई बार अपराध घर की चारदीवारी में छिपे रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में परिवार और समाज का जागरूक होना बेहद जरूरी है। स्कूल, पंचायत और स्थानीय प्रशासन को भी संवेदनशील मामलों में सतर्क भूमिका निभानी चाहिए। पॉक्सो एक्ट के तहत नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों में कठोर सजा का प्रावधान है। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अदालतें ऐसे मामलों में शून्य सहनशीलता की नीति पर काम कर रही हैं।
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