UP Tribal Heritage: थारू-बुक्सा जनजातियों के आभूषण और बर्तन बन रहे पहचान की मिसाल

Published : Feb 02, 2026, 07:15 PM IST
Uttar Pradesh Tribal Heritage jewellery utensils conservation

सार

उत्तर प्रदेश जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान प्रदेश की थारू, बुक्सा, गोंड व अन्य जनजातियों के पारंपरिक आभूषणों और बर्तनों का संरक्षण कर रहा है। प्रदर्शनियों के जरिए जनजातीय कला को नई पहचान और मंच मिल रहा है।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान प्रदेश की समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। संस्थान जनजातियों के पारंपरिक आभूषणों और दुर्लभ बर्तनों के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। यह पहल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की समावेशी विकास की सोच को जमीन पर उतारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

संस्थान द्वारा प्रदेश की विभिन्न जनजातियों के पारंपरिक ढंग से बनाए गए 500 से अधिक आभूषणों और बर्तनों का संरक्षण किया जा रहा है। साथ ही प्रदर्शनियों के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का अवसर भी मिल रहा है।

जनजातीय परंपरा और कला कौशल की पहचान हैं पारंपरिक आभूषण

उत्तर प्रदेश की थारू, बुक्सा, गोंड और बैगा जनजातियों के आभूषण केवल सजावट का साधन नहीं हैं, बल्कि ये उनकी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं का प्रतीक हैं। जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान इन जनजातियों के पारंपरिक आभूषणों को संरक्षित कर उनकी पहचान को जीवंत बनाए हुए है।

संस्थान के निदेशक अतुल द्विवेदी के अनुसार, ये आभूषण पूरी तरह हस्तनिर्मित होते हैं और जनजातीय शिल्पकार इन्हें सदियों पुराने ज्ञान और तकनीक से तैयार करते हैं। इन आभूषणों में गिलेट या गोटा चांदी, पुराने भारतीय सिक्के, मनके, तांबा, पीतल, लकड़ी, हड्डी और सीप जैसी प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग किया जाता है।

निर्माण प्रक्रिया में धातु को भट्टी में गर्म कर तार और चादरों में बदला जाता है, फिर हाथों से उन्हें अंतिम रूप दिया जाता है। हंसली, पायल, करधनी, कड़े, झुमकी, हार, अंगूठियां, बाजूबंद और मंगलसूत्र जैसे आभूषण जनजातीय जीवन का अहम हिस्सा हैं। संस्थान के प्रयासों से न केवल ये पारंपरिक आभूषण संरक्षित हो रहे हैं, बल्कि इन्हें आधुनिक डिजाइन से जोड़कर युवाओं के बीच भी लोकप्रिय बनाया जा रहा है। आज युवा पीढ़ी इन आभूषणों को पारंपरिक, एथनिक और वेस्टर्न परिधानों के साथ भी पहन रही है।

थारू, बुक्सा और अगरिया जनजातियों के पारंपरिक बर्तनों का संरक्षण

संस्थान का कार्य केवल आभूषणों तक सीमित नहीं है। यह थारू, बुक्सा, अगरिया, खरवार और सोनभद्र क्षेत्र की जनजातियों के पारंपरिक पीतल, तांबे और मिट्टी के बर्तनों के संरक्षण में भी सक्रिय है। इन जनजातियों के धातु पात्र, मृदभांड और जंगली लौकी से बनी ‘तुंबी’ आज भी उनकी पारंपरिक जीवनशैली को दर्शाते हैं। अगरिया जनजाति प्राचीन काल से धातु शिल्प में दक्ष रही है, जबकि थारू जनजाति चावल से पेय बनाने के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करती है। संस्थान इन बर्तनों का संरक्षण करने के साथ-साथ नियमित रूप से प्रदर्शनियों का आयोजन भी करता है, जिससे इन पारंपरिक कलाओं को पहचान मिल सके।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिल रही जनजातीय कला को पहचान

उत्तर प्रदेश जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान समय-समय पर आयोजित प्रदर्शनियों के माध्यम से जनजातीय शिल्पकारों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मंच प्रदान कर रहा है। उत्तर प्रदेश दिवस-2026 और जनजातीय भागीदारी महोत्सव जैसे आयोजनों में जनजातीय कलाकारों को सम्मान देकर उनकी कला और गौरव को नई ऊंचाई दी गई है।

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