US Tariff on India: अमेरिका के 100% टैरिफ प्लान से भारत में टेंशन, एक्सपोर्टर्स परेशान

Published : Sep 20, 2026, 07:36 AM IST
US Tariff on India

सार

Trump Tariffs: विपक्ष ने सरकार से पूछा है कि क्या हमारे पास कच्चे तेल का कोई दूसरा विकल्प है। वहीं, भारत अब विदेश मंत्री के यूएन भाषण और जी20 बैठक में अपना रुख साफ करने की तैयारी कर रहा है।

US 100 Percent Tariff on Russian Oil: अमेरिका की ओर से रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की व्यवस्था ने भारत के सामने नई आर्थिक चुनौती खड़ी कर दी है। अमेरिकी कानून के तहत राष्ट्रपति को प्रमुख रूसी ऊर्जा खरीदार देशों पर भारी टैरिफ लगाने का अधिकार मिला है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, इसलिए इस फैसले का असर भारतीय निर्यात और ऊर्जा सुरक्षा दोनों पर पड़ सकता है।

निर्यातकों को सता रही बाजार गंवाने की चिंता

इस संभावित कार्रवाई को लेकर भारतीय निर्यातकों में चिंता बढ़ गई है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस (FIEO) ने भी अमेरिकी टैरिफ के असर को लेकर चिंता जताई है। FIEO की मीडिया सूची में 17 सितंबर को इस मुद्दे पर निर्यातकों की चिंता से जुड़ी रिपोर्ट दर्ज है।

यदि अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान पर भारी अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है, तो कई उत्पादों की कीमत वहां बढ़ सकती है और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है। हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका टैरिफ किन उत्पादों पर, कितनी दर से और किस समयसीमा में लागू करता है।

रूसी तेल घटा तो बढ़ सकती है ऊर्जा की चुनौती

भारत के लिए दूसरी बड़ी चिंता कच्चे तेल की आपूर्ति है। रूस भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है और अगस्त में भारत ने करीब 16 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी कच्चा तेल खरीदा था। ऐसे में अचानक आयात घटाने से वैकल्पिक स्रोतों और वैश्विक तेल कीमतों पर निर्भरता बढ़ सकती है।

विपक्ष ने सरकार से मांगा जवाब

इस मुद्दे पर विपक्ष ने भी केंद्र सरकार से संभावित आर्थिक नुकसान और वैकल्पिक तेल स्रोतों को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। एनसीपी (एसपी) ने सरकार से आर्थिक जोखिम का विस्तृत आकलन सार्वजनिक करने को कहा है।

भारत का फोकस ऊर्जा सुरक्षा पर

भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा प्राथमिकता है और तेल की खरीद बाजार परिस्थितियों तथा व्यावसायिक व्यवहार्यता के आधार पर अलग-अलग स्रोतों से जारी रहेगी। अब नई दिल्ली के सामने चुनौती यह है कि वह सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति के साथ अपने बड़े निर्यात बाजारों के हितों में संतुलन कैसे बनाए रखती है।

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