
बर्गनस्टॉक रिज़ॉर्ट (स्विट्जरलैंड): स्विट्जरलैंड के पहाड़ों में आधी रात के बाद तक खिंची महाशक्तियों की कूटनीतिक जंग आखिरकार सोमवार तड़के एक ऐतिहासिक मोड़ पर आकर रुकी। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की विभीषिका को हमेशा के लिए शांत करने के मकसद से शुरू हुई हाई-लेवल बातचीत का पहला दौर खत्म हो चुका है। मध्यस्थता कर रहे पाकिस्तान और कतर ने इस कूटनीतिक प्रयास को "उम्मीद जगाने वाला" बताया है। दोनों देशों ने अगले 60 दिनों के लिए एक कूटनीतिक रोडमैप तैयार किया है, लेकिन इस महासमझौते के पीछे एक ऐसा सस्पेंस छिपा है, जो किसी भी वक्त पूरी दुनिया को दोबारा युद्ध की आग में झोंक सकता है।
स्विट्जरलैंड में मैराथन बैठकों के बाद अमेरिका और ईरान एक बेहद चौंकाने वाले फैसले पर सहमत हुए हैं। दोनों देशों ने लेबनान में जारी भीषण हिंसा को थामने के लिए एक संयुक्त "डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल" (टकराव रोकने वाला सेल) बनाने का एलान किया है। इस सेल में लेबनान सरकार भी शामिल होगी, जिसका मुख्य काम यह सुनिश्चित करना होगा कि जमीनी स्तर पर सैन्य अभियानों को पूरी तरह रोका जा सके।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने कतर और पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक पोस्ट में लिखा कि लेबनान युद्ध को खत्म करने की दिशा में "बड़ी प्रगति" हुई है। इस अंतरिम राहत के तहत ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात पर लगी रोक हटाने, नाकेबंदी खत्म करने, फ्रीज की गई संपत्ति को जारी करने और ईरान के पुनर्निर्माण की योजनाओं पर सहमति बनी है। लेकिन, अरागची ने अपनी पोस्ट के आखिर में जो लिखा, उसने वाशिंगटन से लेकर यरूशलेम तक सबके कान खड़े कर दिए हैं-"इस पूरी डील का पहला असली टेस्ट 'लेबनान डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल' होगा।"
Tireless Pakistani and Qatari mediation has delivered major progress to end Lebanon War. Oil and petrochem exports are waived, blockade lifted, some frozen assets released, and major reconstruction & development plan launched for Iran.
1st real test: Lebanon deconfliction cell https://t.co/q0okD2qwSO— Seyed Abbas Araghchi (@araghchi) June 22, 2026
यह कूटनीतिक कामयाबी तब सामने आई है जब महज कुछ घंटे पहले तक इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच दक्षिणी लेबनान में बारूद की नदियां बह रही थीं। इजरायली हमलों में 47 लोग मारे गए थे, जबकि हिजबुल्लाह के पलटवार में 4 इजरायली सैनिक ढेर हो गए थे। हिंसा के इस खौफनाक दौर के बीच, एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, पिछले शुक्रवार स्थानीय समयानुसार शाम करीब 4 बजे अचानक एक गुप्त युद्धविराम (सीजफायर) लागू किया गया। हिजबुल्लाह और इजरायल दोनों ने इस युद्धविराम की पुष्टि की है, जिसने पिछले हफ्ते हुए अंतरिम समझौते को टूटने से बचा लिया। लेकिन सवाल अब भी वही है: क्या यह सीजफायर 60 दिनों की इस नाजुक कूटनीतिक प्रक्रिया को संभाल पाएगा?
शांति की इस कोशिश के सामने सबसे बड़ा रोड़ा खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आक्रामक रुख बना हुआ है। ट्रंप लगातार यह बयान दे रहे हैं कि ईरान को इस कूटनीतिक डील से कोई भी आर्थिक फायदा नहीं मिलना चाहिए। उनका मानना है कि ईरान इस वक्त बेहद कमजोर स्थिति में है, इसलिए वाशिंगटन को अपनी शर्तें मनवानी चाहिए। जानकारों का मानना है कि ट्रंप की यह तीखी बयानबाजी और हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल की जिद इस समझौते को किसी भी वक्त तार-तार कर सकती है। अगर हिजबुल्लाह ने एक भी रॉकेट दागा, तो इजरायल लेबनान को दोबारा श्मशान बनाने पर आमादा है, जो सीधे तौर पर इस 60 दिन की डील को हमेशा के लिए दफन कर देगा। सोमवार से शुरू हो रही निचले स्तर की तकनीकी बातचीत में अब देखना होगा कि यह 'डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल' बारूद के ढेर पर टिकी इस शांति को कैसे बचाता है।
स्विट्जरलैंड में हुई वार्ता के साथ अब 60 दिनों की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस दौरान निचले स्तर की बातचीत जारी रहेगी और लेबनान में बनने वाला डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल संघर्ष रोकने की कोशिश करेगा। फिलहाल युद्धविराम लागू हो चुका है और हिंसा में अस्थायी कमी देखने को मिली है, लेकिन असली सवाल अभी भी कायम है-क्या यह शांति टिकेगी या लेबनान एक बार फिर पूरे समझौते को संकट में डाल देगा? दुनिया की नजरें अब स्विट्जरलैंड के कॉन्फ्रेंस हॉल पर नहीं, बल्कि लेबनान के युद्धग्रस्त इलाकों पर टिकी हैं, जहां आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह ऐतिहासिक डील सफलता बनेगी या एक और अधूरी कूटनीतिक कोशिश।
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