
Iran America Agreement: दुनिया की राजनीति में शायद ही कोई रिश्ता अमेरिका और ईरान जितना तनावपूर्ण रहा हो। दशकों से प्रतिबंध, परमाणु विवाद, सैन्य टकराव और पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष इन दोनों देशों के रिश्तों की पहचान रहे हैं। लेकिन अब पहली बार ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि दोनों देश एक ऐसे समझौते के करीब पहुंच चुके हैं, जो पूरे मध्य-पूर्व की राजनीति और वैश्विक तेल बाजार को बदल सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत अब अंतिम दौर में है। अगर यह डील पूरी हो जाती है, तो न सिर्फ 60 दिनों का युद्धविराम बढ़ाया जाएगा, बल्कि होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने और ईरान को बिना रुकावट तेल बेचने की छूट देने जैसे बड़े कदम भी उठाए जा सकते हैं। सबसे अहम बात यह है कि इस समझौते के जरिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी नई बातचीत शुरू होने की संभावना बन गई है।
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अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देश एक MOU यानी समझौता ज्ञापन पर साइन कर सकते हैं। यह प्रारंभिक समझौता फिलहाल 60 दिनों के लिए लागू रहेगा, जिसे आगे बढ़ाया भी जा सकता है। ड्राफ्ट डील में कई बड़े बिंदु शामिल बताए जा रहे हैं:
अगर ऐसा होता है तो वैश्विक तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है, क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है।
ईरान और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा विवाद हमेशा परमाणु कार्यक्रम को लेकर रहा है। हालांकि अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है, लेकिन बातचीत में कुछ अहम संकेत सामने आए हैं। ड्राफ्ट समझौते के मुताबिक:
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के पास करीब 440 किलो संवर्धित यूरेनियम मौजूद है। हालांकि तेहरान ने इसे अमेरिका को सौंपने से इनकार किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर परमाणु मुद्दे पर भरोसे का माहौल बनता है, तो यह पिछले कई वर्षों के सबसे बड़े कूटनीतिक बदलावों में से एक हो सकता है।
अमेरिका फिलहाल पूरी तरह प्रतिबंध हटाने के मूड में नहीं दिख रहा। सूत्रों के मुताबिक, वॉशिंगटन ने साफ कर दिया है कि:
जैसे बड़े फैसले तभी होंगे, जब ईरान अपने वादों को पूरी तरह लागू करेगा। इसी 60 दिन की अवधि के दौरान अमेरिकी सेना क्षेत्र में बनी रहेगी। अंतिम समझौते के बाद ही सैनिकों की वापसी पर फैसला हो सकता है।
इस ड्राफ्ट समझौते में लेबनान में इजराइल और हिज्बुल्लाह के बीच संघर्ष खत्म करने की बात भी शामिल बताई जा रही है। हालांकि इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसको लेकर चिंता जताई है। इजराइल का मानना है कि हिज्बुल्लाह को लेकर नरमी भविष्य में सुरक्षा चुनौती बन सकती है। वहीं अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि अगर हिज्बुल्लाह दोबारा हमला करता है या हथियार जमा करता है, तो इजराइल को कार्रवाई की छूट रहेगी।
इस संभावित समझौते के पीछे कई अरब और मुस्लिम देशों की सक्रिय भूमिका सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कई देशों के नेताओं के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल कर इस डील पर चर्चा की। इसमें शामिल रहे:
इन देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता में अहम भूमिका निभाई है। खासतौर पर पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की तेहरान यात्रा को भी बातचीत आगे बढ़ाने की बड़ी कड़ी माना जा रहा है।
व्हाइट हाउस को उम्मीद है कि बाकी विवादित मुद्दों पर भी जल्द सहमति बन सकती है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि रविवार तक इस समझौते का औपचारिक ऐलान किया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह सिर्फ अमेरिका और ईरान के रिश्तों में बदलाव नहीं होगा, बल्कि:
सब पर इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है। दशकों से दुश्मनी के प्रतीक रहे अमेरिका और ईरान अब क्या वास्तव में नई शुरुआत की ओर बढ़ रहे हैं, दुनिया की नजर इसी सवाल पर टिकी हुई है।
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