
US Iran Nuclear Deal: मध्य पूर्व (Middle East) में पिछले 40 दिनों से बारूद की जो गंध हवाओं में तैर रही थी, वह अब अचानक एक अप्रत्याशित कूटनीतिक मोड़ ले चुकी है। दशकों से एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे अमेरिका और ईरान के बीच परदे के पीछे एक ऐसी 'मेगा डील' पक रही है, जो पूरी दुनिया का नक्शा और समीकरण बदल सकती है। इस बेहद गुप्त और संवेदनशील शांति समझौते की बातचीत अचानक तेज़ हो गई है, जिसने वैश्विक राजनीति के विश्लेषकों को भी चौंका दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब ईरानी मीडिया के हवाले से यह खबर लीक हुई कि तेहरान ने वाशिंगटन को एक गोपनीय 14-सूत्रीय प्रस्ताव भेजा था। उम्मीद के विपरीत, डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व वाले अमेरिकी प्रशासन ने इस पर कड़ा रुख अपनाने के बजाय एक नया और विस्तृत जवाबी प्रस्ताव भेज दिया है। व्हाइट हाउस का यह कदम साफ संकेत दे रहा है कि अमेरिका इस समय मध्य पूर्व में चल रही दुश्मनी और युद्ध के इस सिलसिले को हमेशा के लिए दफन करने के मूड में है। इस नए प्रस्ताव में राजनीतिक, आर्थिक और सबसे संवेदनशील परमाणु शर्तें शामिल की गई हैं।
सूत्रों से जो सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर निकलकर सामने आ रही है, वह आर्थिक मोर्चे से जुड़ी है। अमेरिका ने इस व्यापक शांति ढांचे के तहत ईरान के जब्त किए गए लगभग $25 बिलियन (25 अरब डॉलर) के विशाल फंड को जारी करने का बड़ा दांव खेला है। इतना ही नहीं, वैश्विक व्यापार के लिए सबसे संवेदनशील रूट माने जाने वाले 'होर्मुज़ जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) से जुड़ी आर्थिक पाबंदियों में ढील देने और कुछ सैन्य नाकेबंदियों को हटाने का प्रस्ताव भी मेज पर रखा गया है। लेकिन, अमेरिकी इतिहास को देखते हुए सवाल यही उठता है कि क्या यह सब इतनी आसानी से होगा या इसके पीछे कोई बहुत बड़ी शर्त छिपी है?
कहते हैं कि कूटनीति में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता। अमेरिका अगर अरबों डॉलर का फंड छोड़ने को तैयार है, तो उसकी नजर ईरान के सबसे घातक हथियार यानी परमाणु कार्यक्रम पर है। अमेरिका की सबसे बड़ी शर्त यह है कि ईरान को अपने यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) को 3.67% की कड़े दायरे में सीमित करना होगा। यह वही सीमा है जो पुराने अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौतों में तय की गई थी। इसके अलावा, ईरान को अपनी संवेदनशील परमाणु गतिविधियों को बंद करने के साथ-साथ अपने संवर्धित यूरेनियम के भंडार को देश से बाहर भी भेजना पड़ सकता है। ईरान फिलहाल इस प्रस्ताव के एक-एक बिंदु की बेहद बारीकी से समीक्षा कर रहा है, क्योंकि एक भी गलत कदम उसकी संप्रभुता को खतरे में डाल सकता है।
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा और हैरान कर देने वाला पहलू है इस डील में पाकिस्तान की एंट्री। जब पूरी दुनिया की नजरें महाशक्तियों पर टिकी थीं, तब खुद गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान इस महा-समझौते में एक अहम मध्यस्थ (Mediator) के रूप में उभरा है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच 'बैकचैनल' बातचीत को मुकाम तक पहुँचाने का जिम्मा पाकिस्तान संभाल रहा है। दोनों पुराने प्रतिद्वंद्वियों के बीच संवाद को आसान बनाने और आपसी अविश्वास की खाई को पाटने में पाकिस्तान की यह भूमिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई नए समीकरणों को जन्म दे रही है।
कूटनीतिक कोशिशें अपनी जगह हैं, लेकिन इस बातचीत के ऊपर अनिश्चितता और युद्ध के काले बादल अभी भी पूरी तरह छंटे नहीं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कथित तौर पर एक बेहद सख्त चेतावनी जारी की है कि यदि बहुत जल्द इस समझौते पर दोनों देश किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुँचते हैं, तो अमेरिका ईरान के खिलाफ 'कड़ी सैन्य कार्रवाई' करने से पीछे नहीं हटेगा। इस एक बयान ने चल रही बातचीत के कमरे में दबाव को $100\%$ बढ़ा दिया है।
अब पूरी दुनिया की सांसें थमी हुई हैं कि क्या यह कूटनीति मध्य पूर्व को एक विनाशकारी युद्ध की आग में झुलसने से बचा पाएगी या फिर यह बातचीत किसी नए महायुद्ध का बहाना बनेगी? अगर यह डील फाइनल होती है, तो यह इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होगी।
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