
तेल अवीव/तेहरान/वाशिंगटन डीसी: वैश्विक राजनीति और युद्ध के मैदान से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज खबर आ रही है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही विनाशकारी जंग को खत्म करने के लिए आखिरकार एक ऐतिहासिक अंतरिम समझौते पर दस्तखत हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार रात फ्रांस के उसी ऐतिहासिक 'वर्साय पैलेस' में इस बेहद गोपनीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए, जहां 107 साल पहले प्रथम विश्व युद्ध को खत्म करने वाली वर्साय की संधि पर दस्तखत हुए थे। इस महा-समझौते के वक्त फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों खुद गवाह के तौर पर मौजूद थे।
ट्रंप के तुरंत बाद, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने तेहरान से इलेक्ट्रॉनिक (डिजिटल) तरीके से इस दस्तावेज पर अपनी मुहर लगा दी। भारतीय समयानुसार गुरुवार सुबह 5:30 बजे जैसे ही इस डील का आधिकारिक ऐलान हुआ, पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच तुरंत युद्धविराम लागू हो गया है और होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। हालांकि, इस शांति समझौते के बीच ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर गालिबाफ के बयान ने नई हलचल पैदा कर दी है।
इस पीस डील को लेकर सस्पेंस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पर आधिकारिक तौर पर 19 जून को स्विट्जरलैंड के लूसर्न शहर में हस्ताक्षर होने थे। लेकिन अचानक तय कार्यक्रम से एक दिन पहले ही फ्रांस के वर्साय पैलेस में डिजिटल रूप से इसे फाइनल कर दिया गया। जानकारों का मानना है कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है; जिस जगह प्रथम विश्व युद्ध खत्म हुआ था, ट्रंप ने वहीं से मिडिल ईस्ट के इस महा-संकट को शांत करने का संदेश दिया है। हालांकि, ईरान के भीतर इस गुप्त जल्दबाजी को लेकर सुर बदलने लगे हैं। ईरानी सांसद मालेक शरियती ने सोशल मीडिया पर कुरान की आयत साझा करते हुए ट्रंप के दस्तखत पर सवाल उठाए और कहा, "ट्रंप के वादों पर किसी को भरोसा नहीं है, केवल साइन होना किसी गारंटी के समान नहीं है।"
समझौते पर हस्ताक्षर करने के तुरंत बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पीठ थपथपाते हुए कहा, "अमेरिका के सारे टारगेट पूरे हो चुके हैं और हमने उम्मीद से ज्यादा हासिल किया है।" ट्रंप के मुताबिक, उनका मुख्य मकसद युद्ध को रोकना, होर्मुज को वैश्विक व्यापार के लिए खोलना और ईरान को परमाणु हथियार से दूर रखना था, जो उन्होंने कर दिखाया। लेकिन इसी के साथ उन्होंने तेहरान को बेहद खौफनाक चेतावनी भी दी। ट्रंप ने दोटूक कहा, "अगर ईरान ने इस 14-पॉइंट वाले समझौते की एक भी शर्त का उल्लंघन किया, तो उस पर फिर से भीषण बमबारी की जाएगी।" ट्रंप ने यह भी दावा किया कि इस सैन्य अभियान में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भी ईरान पर जमकर बम बरसाए थे।
इस 14-सूत्रीय ड्राफ्ट समझौते के तहत खबर आई थी कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण के लिए $300 अरब (300 बिलियन डॉलर) का एक बड़ा आर्थिक फंड बनाएंगे। लेकिन इस खबर पर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पानी फेरते हुए एक बड़ा सस्पेंस खड़ा कर दिया है। वेंस ने सख्त लहजे में कहा कि $300 अरब के पैकेज की खबरें पूरी तरह भ्रामक हैं। उन्होंने साफ किया, "अगर ईरान सारी शर्तें मानता है तो दुनिया के दूसरे देश वहां निवेश कर सकते हैं, लेकिन अमेरिकी सरकार अपनी जेब से ईरान को एक डॉलर भी नहीं देने वाली है।" वेंस के इस बयान ने समझौते के आर्थिक भविष्य पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
इस समझौते के तहत तय हुआ है कि फिलहाल 60 दिनों तक होर्मुज स्ट्रेट टोल-फ्री रहेगा और वहां से कमर्शियल जहाजों से कोई टैक्स नहीं लिया जाएगा। लेकिन ईरानी संसद के ताकतवर स्पीकर मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने सरकारी टीवी को दिए एक इंटरव्यू में अमेरिका के होश उड़ा दिए हैं। गालिबाफ ने खुलेआम एलान किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति अब युद्ध से पहले जैसी कभी नहीं रहेगी। इस रणनीतिक रास्ते पर ईरान का पूरा संप्रभु अधिकार है और 60 दिनों के बाद यहां से गुजरने वाले सभी जहाजों से भारी टैक्स (शुल्क) वसूला जाएगा। उन्होंने अमेरिका को चेतावनी भी दी कि अगर वाशिंगटन ने अपने वादे पूरे नहीं किए, तो ईरान भी शर्तों को तोड़ देगा।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के आंकड़ों के मुताबिक, इस युद्ध के शुरू होने तक ईरान 60% तक यूरेनियम संवर्धन कर चुका था और उसके पास 400 किलोग्राम का खतरनाक भंडार मौजूद है। भले ही इस अंतरिम समझौते में ईरान ने वादा किया है कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु कार्यक्रम का अंतिम समाधान अभी भी अधूरा है। 60 दिनों की इस युद्धविराम अवधि के भीतर दोनों देशों को यूरेनियम संवर्धन को सीमित करने पर अंतिम बातचीत पूरी करनी होगी।
इस बीच, मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार रामी खौरी ने चेतावनी दी है कि लेबनान से इजराइली सेना की पूरी वापसी इतनी जल्दी नहीं होगी। अंतिम समझौता होने में 4 से 5 महीने का समय लग सकता है, और इजराइल सुरक्षा के नाम पर दक्षिणी लेबनान में अपनी मौजूदगी बनाए रखेगा। हालांकि, इस शांति समझौते का सबसे बड़ा तात्कालिक असर बाजार पर दिखा है, जहाँ कच्चे तेल की सप्लाई बहाल होने की उम्मीद में ब्रेंट क्रूड तेजी से गिरकर $78.66 प्रति बैरल पर आ गया है, जो पिछले महीने $125 के पार था। अब देखना यह है कि यह कागजी शांति जमीनी हकीकत बनती है या मिडिल ईस्ट में किसी और बड़े धमाके का कारण!
ईरानी सांसद मालेक शरियती ने ट्रम्प के हस्ताक्षर पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल दस्तखत किसी गारंटी की तरह नहीं हैं। उन्होंने अमेरिका के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए समझौते के पालन को लेकर आशंका जताई। इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच 14 बिंदुओं वाले ड्राफ्ट समझौते में युद्ध रोकने, परमाणु हथियार न बनाने, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और समुद्री यातायात बहाल करने जैसी शर्तें शामिल हैं। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या वर्साय पैलेस से शुरू हुई यह शांति पहल वास्तव में मध्य-पूर्व में स्थिरता ला पाएगी या यह सिर्फ एक अस्थायी विराम साबित होगी।
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