अचानक कोलकाता क्यों पहुंचे अमेरिकी विदेश मंत्री? रूबियो के इस दौरे के पीछे छिपा 234 साल पुराना राज!

Published : May 23, 2026, 07:43 AM IST
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सार

मार्को रूबियो की भारत यात्रा ने वैश्विक कूटनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। PM मोदी, S जयशंकर, QUAD, चीन रणनीति, ऊर्जा सुरक्षा और US-India व्यापार समझौते पर होने वाली बंद कमरे की चर्चाओं के बीच दुनिया की नजरें दिल्ली पर टिक गई हैं। क्या यह दौरा एशिया की नई शक्ति संतुलन कहानी लिखेगा? 

नई दिल्ली: शनिवार की सुबह भारतीय कूटनीति के गलियारों में एक नई हलचल लेकर आई। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो अपनी चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर भारत पहुंच चुके हैं। पिछले साल के मध्य से दोनों देशों के बीच उपजे अभूतपूर्व राजनयिक और व्यापारिक तनाव के बीच, रूबियो का यह दौरा बेहद संवेदनशील और रणनीतिक माना जा रहा है। डैमेज कंट्रोल और नए गठजोड़ के इरादे से आई वाशिंगटन की यह हाई-प्रोफाइल टीम भारत के साथ रिश्तों की एक नई इबारत लिखने की कोशिश में है।

दिल्ली के बजाय कोलकाता में पहला कदम…आखिर इसके पीछे क्या है राज?

इस हाई-स्टेक डिप्लोमैटिक ड्रामे की शुरुआत उम्मीद के विपरीत देश की राजधानी दिल्ली से नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक राजधानी कोलकाता से हुई। शनिवार सुबह 7 बजे मार्को रूबियो का विमान कोलकाता उतरा, जिसने कई कूटनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया।

 

 

ऐतिहासिक रहस्य: दरअसल, इस शुरुआत के पीछे एक गहरा ऐतिहासिक संदर्भ छिपा है। कोलकाता में अमेरिका के पहले और दूसरे सबसे पुराने वाणिज्य दूतावास (Consulate) स्थित हैं, जिनकी स्थापना साल 1792 में हुई थी। रूबियो ने कूटनीतिक संदेश देने के लिए इसी ऐतिहासिक भूमि को चुना, जो भारत के साथ अमेरिका के सबसे पहले जुड़ाव का प्रतीक है। कोलकाता में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में शामिल होने के बाद, वे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के लिए नई दिल्ली रवाना होंगे।

ऊर्जा, रक्षा और चीन… क्या है असली एजेंडा?

इस दौरे के औपचारिक आगाज से पहले ही मियामी (अमेरिका) में मीडिया से बात करते हुए मार्को रूबियो ने एक ऐसा बयान दिया जिसने वैश्विक ऊर्जा बाजार में सनसनी फैला दी है। रूबियो ने स्पष्ट घोषणा की है कि अमेरिका भारत को "उतनी ऊर्जा" देने के लिए तैयार है, जितनी नई दिल्ली खरीदना चाहेगी।

वर्तमान में चल रहे ईरान संकट और खाड़ी देशों से तेल आपूर्ति में अनिश्चितता के बीच, अमेरिका अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके तेल और गैस उत्पादन के दम पर भारत के सामने एक बड़ा विकल्प रख रहा है। कूटनीतिक हलकों में सुगबुगाहट है कि रूबियो भारत को वेनेजुएला से भी तेल प्राप्त करने की रणनीति सुझा सकते हैं, जिसका सीधा मकसद भारत की रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता को कम करना है।

पर्दे के पीछे का वो कड़वा सच: ट्रंप के दावों और वीज़ा शुल्क ने कैसे बिगाड़ा था खेल?

रूबियो के इस दौरे के एजेंडे को समझने के लिए पिछले कुछ महीनों के उस तनाव को देखना होगा जिसने दोनों देशों के बीच कड़वाहट घोली थी। पिछले साल जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर दंडात्मक टैरिफ (Punitive Tariffs) लगाए, तो व्यापारिक संबंध पटरी से उतर गए थे।

 

 

बात सिर्फ व्यापार तक ही सीमित नहीं रही; ट्रंप ने बार-बार सार्वजनिक रूप से दावा किया कि पिछले मई में भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य झड़पों को उन्होंने सुलझाया और लाखों लोगों की जान बचाई। नई दिल्ली ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कड़ा रुख अपनाया था कि यह पूरी तरह द्विपक्षीय बातचीत का नतीजा था और इसमें अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी। इसके बाद वाशिंगटन की नई इमिग्रेशन नीति और H1B वीज़ा शुल्क में बढ़ोतरी ने जलती आग में घी का काम किया था।

आगरा, जयपुर और फिर 'क्वाड' का महामंच: क्या तय होगा बीजिंग को घेरने का अंतिम रोडमैप?

इस चार दिवसीय दौरे का शेड्यूल किसी सस्पेंस थ्रिलर की तरह तैयार किया गया है। शनिवार को पीएम मोदी से मुलाकात के बाद, रविवार को रूबियो भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बंद कमरे में द्विपक्षीय वार्ता करेंगे और अमेरिकी दूतावास के स्वतंत्रता दिवस समारोह (250वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में) में शिरकत करेंगे। इसके बाद सोमवार को वे आगरा और जयपुर के रणनीतिक दौरे पर रहेंगे।

QUAD बैठक पर दुनिया की नजरें

असली भू-राजनीतिक बिसात मंगलवार को बिछेगी, जब रूबियो दिल्ली लौटकर मंगलवार को बहुप्रतीक्षित क्वाड (Quad) विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेंगे। जापान और ऑस्ट्रेलिया के प्रतिनिधियों के साथ होने वाली इस बैठक में हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री डकैती और चीन के बढ़ते आर्थिक-सैन्य प्रभाव को काउंटर करने के लिए एक यूनिफाइड रणनीतिक रोडमैप को अंतिम रूप दिया जाएगा। भारत द्वारा यूरोप और न्यूजीलैंड के साथ नए व्यापार समझौते करके अपने पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करने के बाद, अब देखना यह है कि क्या अमेरिका भारत को दोबारा अपने पाले में पूरी तरह खींच पाता है या नहीं।

 

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