
लखनऊ। पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन देखने को मिला है। राज्य सरकार ने स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने, मेडिकल शिक्षा का विस्तार करने और ग्रामीण क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने को प्राथमिकता दी है। नए अस्पतालों के निर्माण, पुराने अस्पतालों के कायाकल्प और मेडिकल कॉलेजों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि से प्रदेश की स्वास्थ्य तस्वीर बदली है।
वर्ष 2017 तक प्रदेश में 36 सरकारी मेडिकल कॉलेज संचालित थे। अब इनकी संख्या बढ़कर 81 हो चुकी है। ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन मेडिकल कॉलेज’ के विजन के तहत हर जिले में मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। एमबीबीएस सीटों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2017 में लगभग 4,690 सीटें थीं, जो अब बढ़कर 12,700 हो चुकी हैं। पीजी सीटों में भी दोगुने से अधिक वृद्धि हुई है, जिससे विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बेहतर हुई है।
प्रदेश के 75 जिलों में जिला अस्पतालों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया गया है। कई अस्पतालों में आईसीयू, एनआईसीयू, डायलिसिस यूनिट, ट्रॉमा सेंटर और आधुनिक पैथोलॉजी लैब स्थापित की गई हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) को हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के रूप में विकसित किया जा रहा है। 1,500 से अधिक हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर क्रियाशील हैं, जहां मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, जांच और गैर-संचारी रोगों की स्क्रीनिंग जैसी सेवाएं उपलब्ध हैं। डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड और टेलीमेडिसिन सेवाओं के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों को विशेषज्ञ डॉक्टरों से जोड़ा गया है।
‘आरोग्य मंदिर’ की अवधारणा के तहत आयुष, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और एलोपैथिक सेवाओं का समन्वय किया जा रहा है। कई जिलों में आयुष अस्पताल और वेलनेस सेंटर बनाए गए हैं। आयुष विश्वविद्यालय की स्थापना की दिशा में भी कदम बढ़ाए गए हैं। अब सभी जिलों में आरटी-पीसीआर लैब, ब्लड बैंक और डिजिटल एक्स-रे जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। कोविड-19 काल में विकसित लैब क्षमता को स्थायी रूप से मजबूत किया गया है। पिछले नौ वर्षों में 200 से अधिक नई पैथोलॉजी और डायग्नोस्टिक यूनिट स्थापित हुई हैं, जिससे जांच की गुणवत्ता और संख्या दोनों में सुधार हुआ है।
108 और 102 एम्बुलेंस सेवाओं का विस्तार किया गया है। वर्तमान में प्रदेश में 4,000 से अधिक एम्बुलेंस संचालित हैं, जिनमें एडवांस लाइफ सपोर्ट एम्बुलेंस भी शामिल हैं। गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के लिए विशेष सेवाएं उपलब्ध हैं। वित्तीय वर्ष 2026-27 में चिकित्सा शिक्षा, आयुष और स्वास्थ्य विभाग के लिए 55,000 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया है। इसमें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के लिए 37,956 करोड़ रुपये, चिकित्सा शिक्षा के लिए 14,997 करोड़ रुपये और आयुष विभाग के लिए 2,867 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। यह राशि ढांचागत विकास, उपकरणों की खरीद, मानव संसाधन भर्ती और मेडिकल कॉलेज निर्माण पर खर्च की जाएगी।
कोविड-19 महामारी के दौरान बढ़ाई गई ऑक्सीजन प्लांट, बेड क्षमता और आईसीयू सुविधाओं को स्थायी रूप से मजबूत किया गया है। लक्ष्य है कि प्रदेश मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने और मरीजों को इलाज के लिए अन्य राज्यों पर निर्भर न रहना पड़े।
पूर्व आईएएस अनुराग पटेल के अनुसार, पिछले नौ वर्षों में हुए बदलाव केवल संख्या वृद्धि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गुणवत्ता और पहुंच दोनों स्तरों पर प्रभावी हैं। मेडिकल कॉलेजों और सीटों में वृद्धि से भविष्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता मजबूत होगी। जिला अस्पतालों के आधुनिकीकरण, हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर और डिजिटल सेवाओं ने ग्रामीण-शहरी अंतर को कम किया है। डायग्नोस्टिक सुविधाओं और एम्बुलेंस नेटवर्क के विस्तार से समय पर उपचार संभव हुआ है। लगातार बढ़ते बजट से स्पष्ट है कि राज्य स्वास्थ्य क्षेत्र को दीर्घकालिक निवेश और आत्मनिर्भरता के मॉडल के रूप में विकसित कर रहा है।
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