
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय एक ऐसा भूचाल आया है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली बंगाल सरकार ने राज्य की सामाजिक कल्याण योजनाओं को लेकर कुछ ऐसे कड़े और अप्रत्याशित फैसलों का ऐलान किया है, जिसने आम जनता से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हड़कंप मचा दिया है। सरकार का साफ कहना है कि जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा और सरकारी मदद केवल "वास्तव में पात्र और जरूरतमंद" लोगों की जेब तक ही पहुंचेगा। इस मुहिम के तहत पुरानी 'लक्ष्मी भंडार योजना' को इतिहास के पन्नों में दफन करके उसकी जगह नई 'अन्नपूर्णा योजना' को लागू कर दिया गया है, लेकिन इसके साथ आए पात्रता के नए नियमों ने हर किसी को हैरत में डाल दिया है।
इस नई व्यवस्था का सबसे चौंकाने वाला और सस्पेंस से भरा पहलू अन्नपूर्णा योजना के 11 पन्नों का वह आवेदन पत्र है, जिसके 'पेज नंबर 8' पर आते ही आवेदकों के पसीने छूट रहे हैं। सरकार ने साफ कर दिया है कि अगर किसी व्यक्ति ने दो से अधिक बार, यानी तीन या उससे अधिक बार शादी की है, तो उसे इस योजना से पूरी तरह अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। इतना ही नहीं, बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर भी सरकार ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। जो माता-पिता या अभिभावक सरकार द्वारा अनिवार्य या आपातकालीन टीकाकरण अभियान (Universal Immunization Program) के तहत अपने बच्चों को टीका लगवाने से इनकार करेंगे, उनकी सरकारी मदद तुरंत रोक दी जाएगी। फॉर्म में चार बच्चों तक के टीकाकरण की पूरी कुंडली मांगी गई है, जो यह साफ करती है कि अब लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं बची है।
अन्नपूर्णा योजना के नियमों में एक और ऐसा मोड़ है जिसने समाज के एक बड़े वर्ग में बहस छेड़ दी है। नए नियमों के मुताबिक, यदि किसी लाभार्थी के बच्चे ने सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल को छोड़कर "कुछ खास धार्मिक शिक्षण संस्थानों" या मदरसों में दाखिला लिया है, तो उस परिवार को मिलने वाली वित्तीय मदद तुरंत प्रभाव से बंद कर दी जाएगी। आवेदकों को अपने बच्चों के स्कूल के प्रकार (सरकारी, निजी या मदरसा) की बिल्कुल सटीक जानकारी देनी होगी। सरकार का यह कदम सीधे तौर पर शिक्षा के आधुनिकीकरण और बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने की बड़ी कूटनीतिक चाल माना जा रहा है।
पश्चिम बंगाल सरकार इस समय राज्य में एक बहुत बड़ा सत्यापन अभियान (Verification Drive) चला रही है, जिसका मकसद लगभग 30 लाख ऐसे संदिग्ध लाभार्थियों को बाहर का रास्ता दिखाना है जो गलत तरीके से सरकारी पैसे का लाभ उठा रहे हैं। इस बार जांच का दायरा इतना सख्त है कि नए एप्लीकेशन फॉर्म में आवेदकों को अपने प्रॉपर्टी के मालिकाना हक, जैसे—जमीन, पक्का मकान, कार और परिवार के किसी सदस्य के सरकारी नौकरी में होने की पूरी जानकारी शपथ-पत्र के साथ देनी होगी। इसके अलावा, राशन कार्ड और अन्य पहचान पत्रों के जरिए गहन जांच की जाएगी। साथ ही, जिन लोगों की पहचान गैर-भारतीय नागरिकों के रूप में होगी, उन्हें सूची से तुरंत बाहर कर दिया जाएगा।
नीतिगत बदलावों की इस आंधी में सुवेंदु कैबिनेट ने एक और बड़ा और कड़ा फैसला लेते हुए धर्म पर आधारित सभी वित्तीय सहायता योजनाओं को आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया है। इसमें मदरसा और सूचना एवं सांस्कृतिक मामलों के विभागों के तहत चल रही पुरानी तुष्टिकरण की योजनाएं शामिल हैं। हालांकि, इस कड़ाई के बीच बंगाल की महिलाओं के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी भी आई है। अन्नपूर्णा योजना के तहत अब सीधे कैश ट्रांसफर की राशि को बढ़ाकर ₹3,000 मासिक भत्ता कर दिया गया है। इसके साथ ही, महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की शानदार सौगात भी दी गई है। राज्य सरकार ने अपनी इस नई व्यवस्था को मजबूत करने के लिए केंद्र की 'आयुष्मान भारत' और 'प्रधानमंत्री चाय श्रमिक प्रोत्साहन योजना' जैसी बड़ी योजनाओं को भी जमीन पर उतार दिया है।
कल्याणकारी योजनाओं में फेरबदल के साथ-साथ सरकार ने राज्य की कानून-व्यवस्था को भी पूरी तरह कस दिया है। ज़ोनिंग के नए नियमों के तहत अब किसी भी स्कूल, कॉलेज, मंदिर या मस्जिद के एक किलोमीटर के दायरे में शराब की दुकान चलाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके अलावा, 'पश्चिम बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल' के जरिए सरकार ने सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने वाले उपद्रवियों से निपटने के लिए असीमित अधिकार हासिल कर लिए हैं। इसी बीच राजनीतिक गलियारे से आई एक और खबर ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की कमर तोड़ दी है-ममता बनर्जी की बेहद करीबी और TMC की राज्य अध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है, जिसने विपक्ष को पूरी तरह बैकफुट पर धकेल दिया है। बंगाल में शुरू हुआ यह नया दौर आने वाले समय में क्या रंग लाएगा, इस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं।
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