
हालाँकि चुनाव पाँच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुए, पर देश-बल्कि दुनिया की नज़रें पश्चिम बंगाल पर टिकी थीं। कुछ आशान्वित थे, कुछ चिंतित, लेकिन हर कोई देख रहा था। भाजपा की जीत की संभावना थी, लहर की नहीं। यही बात सबको चौंका गई।
इसे समझने के लिए 2021 में जाना होगा। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव केवल तनावपूर्ण नहीं थे-वे हिंसक थे। लगभग 300 हिंसक घटनाएँ, चुनाव अवधि में 58 मौतें, और उस समय देश में चुनाव से जुड़ी कुल मौतों में आधे से अधिक बंगाल में हुईं।
राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया। घरों पर हमले हुए, लोग पलायन को मजबूर हुए। यह स्मृति मिटती नहीं, यह बनी रहती है और व्यवहार को आकार देती है। क्योंकि वर्षों से बंगाल एक सरल, कठोर ढाँचे पर चलता रहा है:
अब स्वयं को मतदाता की जगह रखकर देखिए। भले ही आपको सत्ताधारी दल पसंद न हो- क्या आप जोखिम लेंगे? या 'सुरक्षित' वोट करेंगे? यहीं से लोकतंत्र कमजोर होता है- कानून बदलकर नहीं, व्यवहार बदलकर। और भी तरीके थे।- स्थानीय दबाव, मतदान अधिकारियों पर असर। यहाँ तक कि बूथों पर हस्तक्षेप- ताकि विपक्ष के प्रतीक स्पष्ट न दिखें। अगर प्रतीक दिखेगा ही नहीं, तो वोट कैसे देंगे?
एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने बताया- 70% से अधिक शिकायतें दर्ज ही नहीं होतीं। एक सामान्य थाने में मुश्किल से 15 सिपाही होते हैं। कई बार इतने ही सिपाही वरिष्ठ अधिकारियों के आवास पर होते हैं। लेकिन इनके साथ? 300-400 'सिविल वॉलंटियर'- राज्य से वेतन पाने वाले, राजनीतिक रूप से जुड़े, वर्षों से जमे हुए।
जरा हिसाब लगाइए। एक थानेदार के पास 15 सिपाही, और दूसरी ओर सैकड़ों लोग, जो उसी तंत्र का हिस्सा बनकर काम कर रहे हैं।
ऐसी स्थिति में निष्पक्षता केवल कठिन नहीं होती- लगभग निष्प्रभावी हो जाती है।
मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) एक बड़ा मुद्दा बन गया। देखने में यह एक तकनीकी प्रक्रिया थी—सूची को साफ करना, दोहराव हटाना, फर्जी नाम निकालना। लेकिन इसका जो तीखा विरोध हुआ, उसने बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया।
क्योंकि यदि आपकी राजनीतिक ताकत का एक हिस्सा बढ़ी-चढ़ी या त्रुटिपूर्ण मतदाता सूची पर टिका हो, तो उसे साफ करना केवल प्रशासनिक कदम नहीं होता—वह अस्तित्व का प्रश्न बन जाता है।
सिर्फ यह धारणा कि फर्जी या दोहराए गए मतदाता हट सकते हैं- जमीनी व्यवहार बदलने के लिए पर्याप्त होती है।
सबसे बड़ा कारण: सशक्त चुनाव प्रबंधन। चुनाव आयोग के नेतृत्व में, विशेषकर मुख्य चुनाव आयुक्त के तहत, केंद्रीय बलों की व्यापक तैनाती और संवेदनशील क्षेत्रों पर कड़ा नियंत्रण देखने को मिला। यह पहली बार नहीं हुआ- भारत ने यह पहले भी देखा है। टी. एन. शेषन ने दशकों पहले इसकी नींव रखी थी- पर्याप्त बल की मांग, राजनीतिक दबाव के आगे न झुकना, और सुविधा से अधिक मतदाता के विश्वास को प्राथमिकता देना। इस बार भी वही दृष्टिकोण दिखा।
जब भय थोड़ा भी कम होता है, मतदान का पैटर्न बदल जाता है।
बंगाल में यह कोई सामान्य बदलाव नहीं है। यह एक संरचनात्मक परिवर्तन है। 2 लाख से अधिक केंद्रीय बल तैनात किए गए, और महत्वपूर्ण यह कि मतदान के बाद भी बड़ी संख्या में बल वहीं बनाए रखे गए। यही सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि बंगाल में भय केवल मतदान के दिन का नहीं होता- उसके बाद का भी होता है।
ममता बनर्जी के एक कथन में भी यह अनिश्चितता झलकी- 'TMC जीतेगा तो फिर मिलेंगे।' यह कोई आक्रामक घोषणा नहीं लगी, बल्कि जैसे एक स्वीकारोक्ति कि परिणाम पूरी तरह उनके नियंत्रण में नहीं भी हो सकता। यहीं समझ आता है कि जमीन बदल रही है।
यह केवल प्रचार नहीं था- यह बूथ स्तर की योजना थी। महीनों तक कार्यकर्ता और नेता पूरे राज्य में घूमते रहे और एक ही बात दोहराते रहे- आपने किसे वोट दिया, कोई नहीं जान सकता।
सुनने में यह साधारण लगता है, लेकिन है नहीं। भय से संचालित वातावरण में इस विश्वास को फिर से स्थापित करना आधी लड़ाई है। 2021 की स्मृति ऐसी थी कि बहुत कम लोग खुलकर सत्ताधारी दल के खिलाफ वोट देने का जोखिम उठाना चाहते थे। उस मानसिक बाधा को तोड़ना जरूरी था।
एक और महत्वपूर्ण कदम- मतदान के बाद भी केंद्रीय बलों को बनाए रखना। जिस राज्य में परिणाम के बाद हिंसा का इतिहास रहा हो, वहाँ यह प्रक्रिया नहीं, सुरक्षा है। लोकतंत्र केवल बटन दबाने तक सीमित नहीं है। उसके बाद भी आपकी रक्षा होनी चाहिए।
बंगाल कभी एक अग्रणी राज्य था- आर्थिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से। यदि भाजपा इसे केवल राजनीतिक जीत से अधिक मानती है, तो उसे उस ऊर्जा को वापस लाना होगा। बंगाल को जीता नहीं जाना है- उसे पुनर्निर्मित किया जाना है। और इसके लिए केवल एक लहर पर्याप्त नहीं होगी।
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