ममता बनर्जी लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन का आधा कार्यकाल भी पूरा नहीं कर सकीं। हालांकि, 2011 में ममता ने राज्य में 34 साल पुराने वामपंथी शासन को खत्म किया था, लेकिन अब लगता है कि लेफ्ट का रिकॉर्ड तोड़ने से पहले ही ममता को सत्ता से विदाई लेनी पड़ेगी।
ममता बनर्जी लेफ्ट के 34 साल के शासन का आधा भी पूरा नहीं कर पाईं। 2011 में उन्होंने 34 साल पुराने लेफ्ट शासन को खत्म किया था। सत्ता में आने के बाद ममता ने कहा था कि यह बदले की नहीं, बदलाव की सरकार है। लेकिन इसके बाद बंगाल की राजनीति ने एक बिल्कुल अलग मोड़ ले लिया।
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सत्ता में ममता:
राज्य में सत्ता बदलने के बाद एक के बाद एक सीपीएम कार्यकर्ताओं की हत्या हुई। राज्य में हर चुनाव खूनी संघर्ष वाला रहा। हर चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की आंधी चलती थी। ममता की पार्टी टीएमसी ने विपक्ष को खत्म कर दिया। 2016 के विधानसभा चुनाव से ही लेफ्ट का सफाया हो गया था और 2021 में तो लेफ्ट की सीटें शून्य हो गईं।
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बीजेपी का उदय
2021 के चुनाव से ही राज्य की राजनीति में बीजेपी का उदय हुआ। भगवा पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। कभी ममता बनर्जी के दाहिने हाथ माने जाने वाले शुभेंदु अधिकारी विपक्ष के नेता बने।
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शुभेंदु का उदय
एक समय था जब शुभेंदु अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के सांसद थे। वह ममता के शासन में मंत्री भी रहे। ममता ने जिस नंदीग्राम और केशपुर आंदोलन के दम पर सत्ता हासिल की थी, शुभेंदु उस आंदोलन में सबसे आगे थे।
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शुभेंदु बनाम ममता
पिछले पांच सालों से शुभेंदु राज्य की राजनीति में काफी सक्रिय रहे। उन्होंने एक के बाद एक मुद्दों पर ममता बनर्जी और तृणमूल सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने राज्य सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इसी का नतीजा है कि राज्य में एक बार फिर बदलाव की लहर दिख रही है।
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भगवा तूफान
राज्य की राजनीति में इस बार भगवा तूफान देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, बीजेपी 192 सीटों पर आगे है। तृणमूल कांग्रेस 90 से ज्यादा सीटों पर है। लेकिन ऐसा क्यों हुआ? क्या बीजेपी के चुनावी वादे, तृणमूल का भ्रष्टाचार या कुछ और? जैसे-जैसे नतीजे आ रहे हैं, ये सवाल और गहरा होता जा रहा है।
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तृणमूल के गढ़ में बेहाल घासफूल शिविर
दक्षिण बंगाल को तृणमूल का गढ़ माना जाता है। लेकिन वहां भी बीजेपी ने एक के बाद एक जिले पर कब्जा कर लिया है। अनुब्रत मंडल के जिले बीरभूम की कई सीटों पर बीजेपी आगे है। हुगली, नदिया, दक्षिण 24 परगना और यहां तक कि हावड़ा में भी तृणमूल कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ है।
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पीछे मंत्री
वोटों की गिनती में राज्य के करीब 23 मंत्री पीछे चल रहे हैं। इनमें चंद्रिमा भट्टाचार्य और ब्रात्य बसु जैसे बड़े मंत्री शामिल हैं। इस लिस्ट में शौकत मोल्ला और हुमायूं कबीर जैसे तृणमूल के कई बड़े नेता भी हैं, जिन्हें टीएमसी अब तक अजेय मानती थी।
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2 साल में ही धराशायी!
2024 के लोकसभा चुनाव में भी 42 में से 29 सीटें तृणमूल कांग्रेस के पास थीं। बीजेपी की 12 सीटें थीं। लेकिन महज 2 साल में ही राजनीति का मिजाज बदल गया। बीजेपी ने टीएमसी की जीती हुई ज्यादातर सीटों पर कब्जा कर लिया है।
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लौट रहे हैं वामपंथी!
जानकारों का मानना है कि लंबे समय से विधानसभा में शून्य पर अटके लेफ्ट इस बार एक प्रतिनिधि भेज सकते हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, सीपीएम एक सीट पर आगे चल रही है। वहीं, गठबंधन सहयोगी आईएसएफ दो सीटों पर आगे है।
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