
West Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिख रही है। 2011 में 34 वर्षों के वाम शासन को खत्म कर सत्ता में आईं ममता बनर्जी ने ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे पर जनता का भरोसा जीता था। लेकिन 15 साल बाद अब वही जनता बदलाव की नई कहानी लिखती नजर आ रही है। चुनावी रुझान संकेत दे रहे हैं कि इस बार बंगाल में ‘परिवर्तन’ सिर्फ नारा नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की ठोस हकीकत बन सकता है, जहां भारतीय जनता पार्टी पहली बार ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ती दिख रही है।
बंगाल में बीजेपी का सफर बेहद सीमित उपस्थिति से शुरू हुआ था। 90 के दशक में पार्टी के पास केवल एक विधायक और दो सांसद थे। लेकिन दशकों की राजनीतिक मेहनत और संगठन विस्तार के बाद आज वही पार्टी सत्ता के दरवाजे पर खड़ी है। जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राज्य में कमल खिलाना बीजेपी का पुराना सपना रहा है, जो अब साकार होता नजर आ रहा है।
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2011 में ममता बनर्जी ने जिन मुद्दों भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और रोजगार को आधार बनाकर वाम दलों को सत्ता से बाहर किया था, वही मुद्दे अब उनके खिलाफ खड़े हो गए हैं। बीजेपी ने इन विषयों को आक्रामक तरीके से उठाया और ‘परिवर्तन’ का नैरेटिव तैयार किया, जो वोटों में बदलता दिखाई दे रहा है। सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों के सहारे सत्ता में आई सरकार पर अब उद्योग, निवेश और रोजगार के मोर्चे पर पिछड़ने के आरोप लगे। बीजेपी ने इसे प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया और विकास के नए मॉडल का वादा किया।
बंगाल की राजनीति में मुस्लिम वोट लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस की ताकत माने जाते रहे हैं। लेकिन इस बार मालदा, मुर्शिदाबाद और 24 परगना जैसे इलाकों में वोटों का बंटवारा देखने को मिला है। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि पारंपरिक वोट बैंक में दरार आई है। वहीं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, मतुआ समुदाय और चाय बागान के श्रमिकों का झुकाव बीजेपी की ओर दिखा है। उत्तर बंगाल से लेकर जंगल महल तक बीजेपी की पकड़ मजबूत हुई है, जो चुनावी समीकरण को पूरी तरह बदल देता है।
पिछले चुनावों में महिलाओं ने ममता बनर्जी का खुलकर समर्थन किया था। ‘लक्ष्मी भंडार’ और ‘स्वास्थ्य साथी’ जैसी योजनाओं ने महिला वोटरों को आकर्षित किया था। लेकिन इस बार तस्वीर बदलती दिख रही है। बीजेपी ने महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता और मुफ्त बस यात्रा जैसे वादे किए, जो महिला मतदाताओं को प्रभावित करते नजर आए। चुनावी रुझानों से संकेत मिलते हैं कि महिला वोट अब निर्णायक रूप से बंट चुके हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, 15 साल की सत्ता के बाद एंटी-इनकंबेंसी पूरी तरह हावी रही। शिक्षक भर्ती घोटाला, कानून-व्यवस्था पर सवाल और चर्चित मामलों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया। विशेषज्ञों का मानना है कि संगठनात्मक मजबूती और बूथ स्तर पर पकड़ ने बीजेपी को बढ़त दिलाई। वहीं, विपक्षी नेताओं के दल बदल और राजनीतिक दबाव के आरोपों ने भी चुनावी माहौल को प्रभावित किया।
चुनाव आयोग की सख्ती भी इस बार बड़ा फैक्टर बनी। बड़ी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती, पर्यवेक्षकों की निगरानी और प्रशासनिक फेरबदल ने मतदान प्रक्रिया को अपेक्षाकृत निष्पक्ष बनाया। इससे मतदाताओं ने निर्भय होकर मतदान किया, जिसका सीधा असर चुनावी परिणामों पर दिखाई दे रहा है।
बंगाल की राजनीति में यह चुनाव एक युग परिवर्तन की तरह देखा जा रहा है। अगर रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति में बदलाव का संकेत होगा। बीजेपी के लिए यह जीत पूर्वी भारत में पकड़ मजबूत करने का बड़ा अवसर है, वहीं ममता बनर्जी के लिए यह आत्ममंथन का समय साबित हो सकता है। बंगाल की जनता ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि यहां सत्ता स्थायी नहीं, प्रदर्शन स्थायी है।
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