West Bengal Politics: बंगाल का खूनी सियासी खेल, क्या बीजेपी इस सिलसिले को तोड़ेगी?

Published : May 05, 2026, 01:59 PM IST
West Bengal Politics: बंगाल का खूनी सियासी खेल, क्या बीजेपी इस सिलसिले को तोड़ेगी?

सार

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का लंबा इतिहास है। वामपंथियों के 34 साल के शासन ने इसकी नींव रखी, जिसे बाद में TMC ने भी जारी रखा। अब उम्मीद है कि BJP सत्ता में आकर इस खूनी राजनीति की परंपरा को समाप्त करेगी।

West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल... एक ऐसा राज्य जहां सियासी दुश्मनों को हराया नहीं, बल्कि खत्म कर दिया जाता है। यहां पार्टियां बदलती हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन हिंसा की राजनीति का तरीका नहीं बदलता। बंगाल की शान, उसका गौरवशाली इतिहास और बौद्धिक संस्कृति, इन सबको 34 साल के कम्युनिस्ट शासन की खूनी सियासत ने धुंधला कर दिया। गांव से लेकर कोलकाता के सत्ता के गलियारों तक, पार्टी ही सरकार थी और सरकार ही पार्टी। इसी कैडर कल्चर से सियासी दुश्मनी ने जन्म लिया। वोट कौन किसे देगा, ये लोग नहीं, पार्टी तय करती थी। एक पूरी पीढ़ी तक राज करने वाली लेफ्ट पार्टियों ने पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की नींव डाल दी।

गांवों में पड़ोस के घरों से लेकर कोलकाता की सड़कों तक, राजनीतिक विरोधियों को हिंसक तरीके से कुचलना एक संस्कृति बन गई। लेफ्ट पार्टियों ने यह सब सिर्फ इसलिए किया क्योंकि वे किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहना चाहते थे। 34 साल के कम्युनिस्ट राज में 20,000 से ज़्यादा राजनीतिक हत्याएं हुईं और अनगिनत रेप हुए। कर्नाटक में बैठकर वहां हुए इस कुशासन का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है।

उम्मीद बनकर सत्ता में आईं दीदी

इसी खूनी राजनीति के बीच एक उम्मीद बनकर उभरीं ममता बनर्जी। लेफ्ट की हिंसक राजनीति को हराकर सत्ता में तो आईं, लेकिन अपनी कुर्सी बचाने के लिए उन्होंने भी वही रास्ता अपना लिया। बंगाल की टीएमसी में कार्यकर्ता कितने थे पता नहीं, पर गुंडों की कोई कमी नहीं थी। 2018 का पंचायत चुनाव हो, 2021 के चुनाव के बाद की हिंसा हो, या 2023 के पंचायत चुनाव के बाद का खून-खराबा, सब एक जैसा था। विरोधी पार्टियों के दफ्तरों में आग लगाना, लोगों के घरों में घुसकर टीएमसी को वोट देने की धमकी देना बंगाल में आम बात हो गई। गांवों में टीएमसी का विरोध करने वालों के पास दो ही रास्ते थे - या तो गांव छोड़ दो, या टीएमसी को वोट दो। टीएमसी का विरोध करने वालों को जहां-तहां पीटा गया, झूठे केसों में जेल में डाल दिया गया। जिन्होंने विरोध किया, उन्हें खत्म कर दिया गया और उनके घर की महिलाओं पर अत्याचार किए गए। ममता के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया।

ममता के राज में 300 से ज़्यादा राजनीतिक हत्याएं हुईं, जबकि रेप के मामलों का तो कोई हिसाब ही नहीं। कई महिलाओं ने तो इज्जत के डर से पुलिस स्टेशन का मुंह तक नहीं देखा। उन्हें यह भी भरोसा नहीं था कि अगर वे शिकायत करने गईं तो सुरक्षित घर लौट पाएंगी।

2021 के बाद हालात और भी खराब

2021 तक टीएमसी की खूनी राजनीति एक स्तर पर थी, लेकिन उसके बाद के हालात और भी भयानक हो गए। थोक में वोट पाने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति, अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए रेड कार्पेट बिछाना, और सिर्फ इसलिए हिंदुओं को निशाना बनाना क्योंकि उन्होंने बीजेपी का समर्थन किया था, यह सब टीएमसी के गुंडों के जरिए चल रहा था। बंगाल के लोगों के सब्र का बांध टूटने में 15 साल लग गए। इसका नतीजा ये हुआ कि 2011 में एक भी सीट न जीत पाने वाली बीजेपी, 2016 में 3 सीटों पर सिमटने वाली बीजेपी, आज 77 से 206 सीटें जीतने के स्तर पर आ गई है।

उम्मीद है कि कम्युनिस्टों द्वारा शुरू की गई और टीएमसी द्वारा आगे बढ़ाई गई इस खूनी राजनीति को बीजेपी आगे नहीं बढ़ाएगी। बंगाल के लिए बीजेपी का यही सबसे बड़ा अच्छा काम होगा। क्योंकि जो लोग पहले लेफ्ट और टीएमसी के कैडर थे, वही आज बीजेपी का झंडा उठा रहे हैं। पार्टियां और सरकारें बदल गईं, लेकिन हिंसा की जहरीली सियासी संस्कृति अब यहीं खत्म होनी चाहिए।

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