ISRO 4 सितंबर को GSLV-F17 से EOS-5 लॉन्च करेगा। 36,000 KM ऊपर से निगरानी करने वाला यह मिशन PSLV की नाकामियों के बाद भरोसे की बड़ी परीक्षा है।
ISRO Naughty Boy Explained: 4 सितंबर को तड़के 2:55 बजे, जब देश का ज्यादातर हिस्सा नींद में होगा तब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) एक अहम मिशन की तैयारी में होगा। श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल GSLV-F17 रात के अंधेरे को चीरते हुए अंतरिक्ष की ओर रवाना होगा। इस रॉकेट के साथ EOS-5 सैटेलाइट को भेजा जाएगा। इसे भारत का पहला ऐसा इमेजिंग सैटेलाइट बताया जा रहा है, जो पृथ्वी से करीब 36,000 किलोमीटर ऊपर जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से काम करेगा।
ISRO के लिए क्यों खास है आज की रात
ISRO के लिए यह मिशन सिर्फ एक और सैटेलाइट लॉन्च नहीं है। यह एक तरह से वापसी की कोशिश और भरोसे की परीक्षा भी है। हाल के महीनों में लगातार लॉन्च नाकामियों के बाद ISRO के सामने अपनी विश्वसनीयता फिर से मजबूत करने की बड़ी चुनौती है। इस मिशन के दांव पर सिर्फ एक अत्याधुनिक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट नहीं है, बल्कि उस संस्था की साख भी है, जिसे भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी ताकत का प्रतीक माना जाता है।
PSLV की नाकामियों के बाद ISRO के सामने बड़ी चुनौती
हाल का समय ISRO के लिए आसान नहीं रहा है। लंबे समय से भरोसेमंद माने जाने वाले PSLV को 2025 और 2026 में लगातार कुछ नाकामियों का सामना करना पड़ा।
इसके बाद सरकार ने इस लॉन्चर की उड़ानों को रोक दिया और इसकी विस्तृत जांच और टेस्टिंग का काम जारी है।
PSLV को दुनिया के सबसे भरोसेमंद रॉकेटों में गिना जाता रहा है। इसलिए उसकी लगातार नाकामियां ISRO के लिए काफी चिंता का विषय बनीं।
हालांकि, EOS-5 मिशन के लिए इस्तेमाल होने वाला GSLV Mk II, PSLV से अलग रॉकेट परिवार का हिस्सा है।
दोनों के इंजन और मुख्य प्रोपल्शन सिस्टम एक जैसे नहीं हैं।
यानी PSLV में आई तकनीकी समस्याओं को सीधे GSLV Mk II से जोड़ना सही नहीं होगा।
यह अंतर इस मिशन के लिए कुछ राहत देने वाला है। इंजीनियरों को उम्मीद है कि GSLV-F17 अपनी अलग तकनीकी क्षमता के आधार पर सफल उड़ान भर सकता है।
क्या है 'नॉटी ब्वॉय'?
ISRO का नॉटी ब्वॉय यानी GSLV और भरोसे की कहानी हमेशा आसान नहीं रही है। ISRO के अंदर GSLV को लंबे समय से एक खास उपनाम से जाना जाता है-'नॉटी बॉय' यानी शरारती बच्चा।
इस नाम की वजह रॉकेट का शुरुआती दौर रहा है। इसके विकास के शुरुआती वर्षों में GSLV ने कई बार अप्रत्याशित व्यवहार किया।
अपनी पहली 18 उड़ानों में से 6 मिशन पूरी तरह सफल नहीं हो पाए। दशकों की मेहनत के बावजूद GSLV की हर उड़ान के साथ कुछ न कुछ तनाव जुड़ा रहा।
इसके मुकाबले PSLV ने लंबे समय तक काफी ज्यादा भरोसेमंद रॉकेट की छवि बनाई।
लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद GSLV भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक बना हुआ है।
क्रायोजेनिक इंजन बना भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती
GSLV की कहानी सिर्फ एक रॉकेट की कहानी नहीं है। यह भारत के तकनीकी संघर्ष और आत्मनिर्भरता की भी कहानी है।
इस कहानी के केंद्र में है क्रायोजेनिक इंजन। रॉकेट तकनीक में इसे सबसे जटिल प्रोपल्शन सिस्टम में से एक माना जाता है।
1990 के दशक में भारत ने भारी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने की अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए रूस से क्रायोजेनिक तकनीक हासिल करने की कोशिश की थी।
लेकिन इस प्रयास ने बड़ा जियोपॉलिटिकल विवाद खड़ा कर दिया। अमेरिका ने मिसाइल प्रसार से जुड़ी चिंताओं का हवाला देते हुए इस तकनीक के ट्रांसफर का विरोध किया।
अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण भारत को कई प्रतिबंधों और मुश्किलों का सामना करना पड़ा और जरूरी क्रायोजेनिक तकनीक हासिल नहीं हो सकी।
कई देशों के लिए ऐसी स्थिति में यह सपना खत्म हो सकता था। लेकिन भारत ने अपना रास्ता खुद बनाने का फैसला किया।
भारत ने खुद विकसित की क्रायोजेनिक तकनीक
ISRO के वैज्ञानिकों ने स्वदेशी क्रायोजेनिक प्रोपल्शन सिस्टम विकसित करने की लंबी और कठिन प्रक्रिया शुरू की। इस दौरान कई असफलताएं आईं। डिजाइन में बदलाव किए गए, बार-बार टेस्ट हुए और कई तकनीकी रुकावटों का सामना करना पड़ा।
क्रायोजेनिक इंजन को ऐसी परिस्थितियों में काम करना होता है, जहां तापमान माइनस 250 डिग्री सेल्सियस से भी कम हो सकता है। ऐसे वातावरण में लिक्विड हाइड्रोजन और लिक्विड ऑक्सीजन शक्तिशाली रॉकेट प्रोपेलेंट के रूप में इस्तेमाल होते हैं।
आखिरकार भारत ने इस तकनीक में सफलता हासिल की। स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज वाले GSLV की उड़ानें इस बात का प्रमाण बनीं कि भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव और तकनीकी मुश्किलों के बावजूद भारत ने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी। इस उपलब्धि ने भारत की सैटेलाइट लॉन्च क्षमता को काफी बदल दिया।
EOS-5 क्या है और क्यों है इतना खास?
EOS-5 को हाल के वर्षों में भारत के महत्वपूर्ण अर्थ ऑब्जर्वेशन मिशनों में शामिल किया जा सकता है।
ISRO के मिशन डॉक्यूमेंटेशन के अनुसार, EOS-5 एक अत्याधुनिक Earth Observation Spacecraft है।
इसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से काम करने वाला भारत का पहला इमेजिंग सैटेलाइट बताया जा रहा है।
GSLV-F17 पहले इस सैटेलाइट को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचाएगा।
इसके बाद सैटेलाइट को उसकी निर्धारित कक्षा में स्थापित किया जाएगा। EOS-5 का वजन करीब 2,367 किलोग्राम है।
36,000 KM की ऊंचाई से भारत पर रखेगा नजर
लो अर्थ ऑर्बिट में काम करने वाले सैटेलाइट किसी खास इलाके के ऊपर से समय-समय पर गुजरते हैं। ऐसे सैटेलाइट लगातार एक ही जगह पर नजर नहीं रख सकते।
इसके उलट EOS-5 को पृथ्वी से करीब 36,000 किलोमीटर ऊपर जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में एक खास स्थिति में रखा जाएगा। वहां से यह भारत के ऊपर लगातार निगरानी करने की क्षमता देगा।
इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे उपमहाद्वीप के ऊपर बहुत ऊंचाई पर एक बाज लगातार चक्कर लगा रहा हो और अपनी नजर एक ही क्षेत्र पर बनाए रखता हो।
लो ऑर्बिट वाले सैटेलाइट जहां घंटों या दिनों के अंतराल पर किसी इलाके की तस्वीर लेते हैं, वहीं EOS-5 से लगातार निगरानी की सुविधा मिलने की उम्मीद है।
किस काम आएगा EOS-5?
EOS-5 की लगातार निगरानी क्षमता कई क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है। इससे मौसम प्रणालियों, बादलों की आवाजाही, चक्रवातों और पर्यावरणीय बदलावों पर नजर रखने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा बाढ़, सूखा और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी लगातार तस्वीरें और जानकारी महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।
राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे की निगरानी के लिए भी ऐसी क्षमता उपयोगी हो सकती है।
भारत के पास दशकों से अलग-अलग तरह के अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट रहे हैं, लेकिन जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से लगातार इमेजिंग करने वाला ऐसा खास स्पेसक्राफ्ट नहीं रहा। EOS-5 इसी कमी को पूरा करने की कोशिश है।
यह मिशन ऐसे समय में हो रहा है, जब अर्थ ऑब्जर्वेशन की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। जलवायु परिवर्तन, चरम मौसम, हिमालय में ग्लेशियरों की गतिविधियां, बाढ़, सूखा, जंगल की आग और तटीय क्षेत्रों में बदलाव जैसी घटनाओं पर तेजी से नजर रखना जरूरी हो गया है।
ऐसे में अंतरिक्ष से लगातार निगरानी वैज्ञानिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण फायदा दे सकती है।
एक स्थायी नजर मौसम और पर्यावरण की बदलती स्थिति को समझने के साथ-साथ आपदा के समय तेजी से प्रतिक्रिया देने में भी मदद कर सकती है।
51.7 मीटर ऊंचा GSLV-F17 कितना ताकतवर है?
जिस रॉकेट पर EOS-5 को अंतरिक्ष तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है, वह खुद बेहद खास मशीन है।
GSLV-F17 की ऊंचाई 51.7 मीटर है और लॉन्च के समय इसका वजन करीब 420.5 टन होगा। इसमें तीन मुख्य स्टेज हैं।
पहले स्टेज में एक सॉलिड कोर मोटर के साथ चार लिक्विड फ्यूल स्ट्रैप-ऑन बूस्टर लगाए गए हैं।
दूसरे स्टेज में लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम का इस्तेमाल होता है।
तीसरे स्टेज में स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज है। यही तकनीक GSLV की सबसे महत्वपूर्ण पहचान में से एक है।
GSLV-F17 श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से उड़ान भरेगा और EOS-5 को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट तक पहुंचाएगा।
NISAR लॉन्च से भी बढ़ा GSLV Mk II पर भरोसा
हाल के वर्षों में GSLV Mk II का महत्व और बढ़ा है। दुनिया के सबसे महंगे सिविलियन अर्थ इमेजिंग सैटेलाइट्स में शामिल NISAR को ऑर्बिट में पहुंचाने के लिए भी इसी लॉन्चर पर भरोसा किया गया था। यह फैसला भारतीय लॉन्च व्हीकल की क्षमताओं में अंतरराष्ट्रीय भरोसे को दिखाता है। खास तौर पर तब, जब GSLV का अतीत कई सफलताओं और असफलताओं से भरा रहा है। अब EOS-5 मिशन इस भरोसे को और मजबूत करने का एक और मौका है।
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