
Danish Irshad PoK: पाकिस्तान में सच बोलना अब अपराध की श्रेणी में आ गया है। हाल ही में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में हो रहे उग्र विरोध प्रदर्शनों की जमीनी हकीकत दुनिया के सामने लाने वाले पत्रकार दानिश इरशाद (Danish Irshad) को बिना किसी मुकदमे या अपराध के आतंकवादियों की निगरानी सूची (Fourth Schedule) में डाल दिया गया है। सबसे बड़ी बात कि उनके खिलाफ इस कार्रवाई से पहले कोई आपराधिक दोषसिद्धि या ट्रायल नहीं हुआ था। इमरान खान की पार्टी PTI ने भी पाकिस्तानी हुकूमत के इस कदम को 'फासीवाद' करार दिया है। आइए जानते हैं आखिर दानिश इरशाद कौन हैं, वह क्या रिपोर्ट करते रहे हैं और पाकिस्तान ने उनके खिलाफ इतना बड़ा कदम क्यों उठाया?
दानिश इरशाद पाकिस्तान के रावलपिंडी क्षेत्र से जुड़े पत्रकार और रिसर्चर हैं। कश्मीर टाइम्स (Kashmir Times) की प्रोफाइल के मुताबिक, उन्होंने करीब 10 साल से पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू-कश्मीर में पत्रकारिता की है और मुजफ्फराबाद और इस्लामाबाद में रिपोर्टिंग की है। वह क्षेत्र की अंदरूनी राजनीति पर नजर रखने वाले पत्रकार के तौर पर काम करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग सिर्फ रोज की राजनीतिक खबरों तक सीमित नहीं रही है। दानिश ने POK की राजनीति, वहां के शासन, स्थानीय लोगों की मांगों और पाकिस्तान के साथ क्षेत्र के प्रशासनिक रिश्तों जैसे मुद्दों पर लगातार लिखा है। कश्मीर टाइम्स के लिए वह कॉलम भी लिखते हैं। उनकी प्रोफाइल में उन्हें 'Azadi ke Baad' (After Freedom) नाम की किताब का लेखक भी बताया गया है।
Kashmiri Journalist Danish Irshad Placed on Pakistan's Terrorism Watchlist as PaJK Crackdown Widens https://t.co/V0TR7DB98o @Ajk_Updates_ @KASHMIRUSA @Kashmiruk99 @Hindus4HR @democracynow @hrw #HumanRightsViolations @UNPeacebuilding @KashmiriWaheeda @mirwaizmanzil @HamidMirPAK
— Kashmir Times (@KashmirTimes_) August 21, 2026
दानिश ने 2015 में इस्लामाबाद से पत्रकारिता शुरू की थी और इसके बाद POK की राजनीति और वहां के सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रम को करीब एक दशक तक कवर किया। Kashmir Times पर उनकी हाल की रिपोर्टों से भी पता चलता है कि वह POK में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक घटनाक्रम पर लगातार लिख रहे थे। अगस्त 2026 में उन्होंने मुजफ्फराबाद में तनाव और ताजा झड़पों तथा जुलाई में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई हिंसा पर रिपोर्ट की थी। यानी जिस क्षेत्र को वह सालों से कवर कर रहे थे, उसी क्षेत्र में हाल के विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के बीच उनका नाम पाकिस्तान की 'फोर्थ शेड्यूल' लिस्ट में आ गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, 29 जुलाई को तथाकथित 'AJK Home Department' की ओर से जारी आदेश में दानिश इरशाद का नाम 'फोर्थ शेड्यूल' में शामिल किया गया। इस लिस्ट में POK से जुड़े कुल 24 लोगों के नाम बताए गए हैं और दानिश का नाम 12वें नंबर पर बताया गया है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, नोटिफिकेशन में दानिश के खिलाफ कोई स्पष्ट व्यक्तिगत आरोप नहीं बताया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, आदेश में जम्मू-कश्मीर JAAC (Joint Awami Action Committee) से जुड़े लोगों का उल्लेख किया गया है। पाकिस्तान ने जून में इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया था। यहीं से मामले ने बड़ा राजनीतिक और प्रेस फ्रीडम विवाद खड़ा कर दिया है।
POK में लंबे समय से राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सब्सिडी, शासन और दूसरे स्थानीय मुद्दों को लेकर असंतोष देखने को मिल रहा है। विरोध आंदोलन में JAAC की भूमिका प्रमुख रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में पाकिस्तान में बसे कश्मीरी शरणार्थियों के लिए विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की मांग भी शामिल रही है। जून में सरकार की ओर से JAAC पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद कार्रवाई और तेज हुई। इसके बाद गिरफ्तारियां, सुरक्षा कार्रवाई और इंटरनेट तथा मीडिया से जुड़ी पाबंदियों की खबरें सामने आती रहीं। Kashmir Times के अनुसार, 20 जून को ही JAAC से जुड़े 147 कार्यकर्ताओं और समर्थकों को 'फोर्थ शेड्यूल' में डाल दिया गया था और बाद में इस लिस्ट में और नाम जोड़े गए।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 'फोर्थ शेड्यूल' में दानिश का नाम डालने की वजह के तौर पर कोई विशिष्ट व्यक्तिगत अपराध या घटना सामने नहीं आई है। 'Drop Site News' की रिपोर्ट के मुताबिक, दानिश हाल में उन परिवारों का इंटरव्यू कर रहे थे, जिनके बच्चों के पाकिस्तान की सुरक्षा बलों द्वारा मारे जाने का आरोप लगाया गया था। उनकी यह रिपोर्टिंग POK में चल रहे बड़े स्तर पर विरोध और सुरक्षा कार्रवाई के बीच हुई। दानिश ने खुद कहा कि उन्हें न तो किसी अदालत ने दोषी ठहराया और न ही उनका ट्रायल हुआ। उन्होंने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिना कोर्ट के आदेश और बिना ट्रायल किसी का नाम 'फोर्थ शेड्यूल' में डालना राज्य की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
'फोर्थ शेड्यूल' सीधे तौर पर 'दोष सिद्ध आतंकवादियों की लिस्ट' नहीं है। यह पाकिस्तान में एंटी टेररिस्ट एक्ट (Anti-Terrorism Act) के तहत इस्तेमाल की जाने वाली एक प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था है। इसमें उन लोगों को रखा जा सकता है जिन पर अधिकारियों को प्रतिबंधित संगठनों या आतंकवाद से जुड़े संबंधों का संदेह हो। इस लिस्ट में नाम आने के बाद व्यक्ति की सामान्य जिंदगी पर कई तरह की पाबंदियां लग सकती हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इनमें यात्रा पर रोक, बैंक अकाउंट और वित्तीय सेवाओं पर प्रतिबंध और राज्य की अतिरिक्त निगरानी जैसी कार्रवाई शामिल हो सकती है।
Kashmir Times के मुताबिक, दानिश को कथित तौर पर यह आदेश सीधे नहीं दिया गया था। उन्होंने 18 अगस्त को सोशल मीडिया के जरिए पहली बार अपने नाम के 'फोर्थ शेड्यूल' में होने की जानकारी हासिल की और बाद में POK के 'Home Department' के एक स्रोत से इसकी पुष्टि की। यानी जिस आदेश के कारण उनकी जिंदगी पर कई तरह की पाबंदियां लग सकती हैं, उसके बारे में उन्हें कथित तौर पर सरकारी स्तर पर सीधे जानकारी नहीं दी गई।
दानिश के खिलाफ कार्रवाई पर सिर्फ बाहर से ही सवाल नहीं उठे हैं। पाकिस्तान के पत्रकारों और एक्टिविस्टों ने भी इसे प्रेस की आजादी से जोड़कर देखा है। पाकिस्तानी पत्रकार सालेह सफीर अब्बासी (Saleh Safeer Abbasi) ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया। वहीं दूसरे पत्रकारों और एक्टिविस्टों ने सवाल उठाया कि अगर कोई पत्रकार विरोध प्रदर्शनों, सरकारी कार्रवाई और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग करता है, तो क्या उसके खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए? 'BBC Urdu' से जुड़े पत्रकार रूहान अहमद (Roohan Ahmed) ने दानिश को एक प्रोफेशनल पत्रकार और रिसर्चर बताते हुए कहा कि वह उन लोगों की आवाज बनने की कोशिश करते रहे हैं जिन्हें अपनी बात रखने के लिए मंच की जरूरत है। उन्होंने दानिश की सूची में एंट्री को एक आलोचनात्मक आवाज को दबाने की कोशिश के तौर पर देखा।
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