कौन थे सोनम वांग्याल? जिन्होंने 42 साल पहले किया था अनशन, अब उसी रास्ते पर बेटा

Published : Jul 18, 2026, 05:05 PM IST
Sonam Wangyal Biography

सार

Who is Sonam Wangchuk Father: सोनम वांग्याल कौन थे, जिन्होंने 1984 में लद्दाख के लिए भूख हड़ताल कर प्रधानमंत्री को लेह आने पर मजबूर कर दिया था। आज उनके बेटे भी उसी रास्ते पर हैं।

Sonam Wangyal and Sonam Wangchuk: शनिवार की सुबह दिल्ली के जंतर-मंतर से 59 साल के एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने उठाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया। वांगचुक पिछले 21 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर थे। उनकी गिरती सेहत को देखते हुए पुलिस ने यह कदम उठाया। समर्थकों का आरोप है कि उन्हें जबरन उठाया गया, जबकि पुलिस का कहना है कि यह कदम हाईकोर्ट के निर्देशों और मेडिकल सलाह पर उठाया गया। इसके बाद 42 साल पुरानी एक कहानी चर्चा में आ गई। यह कहानी सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल की है। बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके पिता ने भी लद्दाख की मांगों को लेकर भूख हड़ताल की थी। आइए जानते हैं सोनम वांग्याल कौन थे और तब क्या हुआ था...

सोनम वांग्याल कौन थे?

सोनम वांग्याल (Sonam Wangyal) का जन्म 1923 में एक बेहद गरीब किसान परिवार में हुआ था। बचपन में उनके पास ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन मेहनत और हिम्मत की कमी भी नहीं थी। साल 1965 में उन्होंने सिर्फ 23 साल की उम्र में माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर इतिहास रच दिया। उस समय वे एवरेस्ट फतह करने वाले सबसे कम उम्र के लोगों में शामिल थे। इस उपलब्धि के बाद उनका नाम पूरे देश में जाना जाने लगा।

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राजनीति में आए और लद्दाख की आवाज बने

एवरेस्ट जीतने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जिंदगी में कदम रखा। वे जम्मू-कश्मीर विधान परिषद के सदस्य रहे। बाद में विधायक और मंत्री भी बने। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह रही कि उन्होंने लद्दाख के लोगों के अधिकारों और उनकी पहचान के लिए लगातार आवाज उठाई।

1984 में क्यों करना पड़ा अनशन?

साल 1984 में सोनम वांग्याल ने भूख हड़ताल शुरू की। उनकी मांग थी कि लद्दाख के कई जनजातीय समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मिले। उनका मानना था कि इससे इन समुदायों को शिक्षा, रोजगार और विकास के बेहतर मौके मिलेंगे। यह आंदोलन इतना बड़ा हुआ कि उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक को इस मुद्दे पर ध्यान देना पड़ा। हालांकि, उस वक्त मांग पूरी नहीं हुई, लेकिन आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान लद्दाख की ओर खींच दिया।

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पांच साल बाद मिली बड़ी जीत

अनशन खत्म होने के बाद भी संघर्ष नहीं रुका। करीब पांच साल बाद, 1989 में केंद्र सरकार ने संविधान के तहत जम्मू-कश्मीर की कई जनजातीय समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया। इसमें लद्दाख के कई समुदाय भी शामिल थे। इसे उस लंबे आंदोलन की बड़ी सफलता माना गया, जिसमें सोनम वांग्याल की अहम भूमिका थी।

अब बेटे सोनम वांगचुक ने चुना वही रास्ता

अब सोनम वांगचुक भी अपनी मांगों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे। शनिवार को उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली के जंतर-मंतर से अस्पताल ले जाया गया। हालांकि, पिता और बेटे के मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ने अपनी बात रखने के लिए अनशन को ही अपना तरीका चुना। यही वजह है कि आज लोग एक बार फिर सोनम वांग्याल चर्चा में आ गए हैं।

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