ट्रंप बोले “ऐतिहासिक जीत”, लेकिन अमेरिकी सेना क्यों नहीं मान रही ईरान सीजफायर को अपनी सफलता?

Published : Apr 09, 2026, 06:58 PM IST
Why the US Army Is Not Calling the Iran Ceasefire a Victory Despite Trump Claims

सार

Iran US Ceasefire: ईरान के साथ सीजफायर को डोनाल्ड ट्रंप ऐतिहासिक जीत बता रहे हैं, लेकिन अमेरिकी सेना इसे अपनी सफलता मानने से बच रही है। आखिर क्यों सेना सतर्क है, युद्ध में कितना नुकसान हुआ और कौन-से लक्ष्य अधूरे रह गए? पढ़ें पूरा विश्लेषण।

Trump Iran War Claim Victory: ईरान के साथ संघर्ष के बाद घोषित हुए सीजफायर को लेकर अमेरिका के भीतर ही अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और उनके सहयोगी इस समझौते को बड़ी कूटनीतिक और सैन्य जीत बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी कई पोस्ट और वीडियो शेयर किए जा रहे हैं जिनमें ईरान को हारने वाला बताया जा रहा है।

लेकिन दूसरी तरफ अमेरिकी सेना का रुख इससे अलग दिखाई दे रहा है। सेना के अधिकारी इस पूरे मामले पर बेहद सावधानी से प्रतिक्रिया दे रहे हैं और इसे खुलकर अपनी जीत बताने से बच रहे हैं। रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि सेना ऐसा इसलिए कर रही है ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे आलोचना का सामना न करना पड़े।

युद्ध में भारी नुकसान, फिर भी लक्ष्य अधूरा

रिपोर्टों के मुताबिक इस संघर्ष में अमेरिका को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। युद्ध के दौरान 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई, जबकि कई सैनिक घायल हुए। इसके अलावा 170 सैनिकों के घायल होने की जानकारी भी सामने आई है।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी सेना जिस मकसद से युद्ध में उतरी थी, वह पूरा नहीं हो पाया। ईरान में न तो सत्ता परिवर्तन हुआ और न ही वहां की सरकार ने आत्मसमर्पण किया। उलटे अमेरिकी हमलों को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि कुछ हमले नागरिक इलाकों और लड़कियों के स्कूलों के आसपास हुए, जिन्हें युद्ध अपराध की श्रेणी में देखा जा सकता है।

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खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को नुकसान

अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी नुकसान पहुंचा है। दावा किया गया है कि युद्ध के दौरान ईरान ने कई जवाबी हमले किए, जिनमें अमेरिकी जहाजों और ठिकानों को निशाना बनाया गया। जानकारी के मुताबिक अमेरिकी एयरफोर्स ने हजारों मिसाइलों से ईरान पर हमले किए, लेकिन इसके बावजूद निर्णायक परिणाम सामने नहीं आया। यही वजह है कि सेना इस संघर्ष को पूरी तरह सफल अभियान के रूप में पेश करने से बच रही है।

युद्ध पर भारी खर्च

इस युद्ध में अमेरिका को आर्थिक रूप से भी बड़ा खर्च उठाना पड़ा। अनुमान है कि सैन्य कार्रवाई पर करीब 40 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। यह अमेरिका के कुल रक्षा बजट का लगभग 5 प्रतिशत बताया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार जब इतना बड़ा सैन्य और आर्थिक संसाधन खर्च हो और उसके बाद भी घोषित लक्ष्य हासिल न हों, तो सेना के लिए इसे खुलकर जीत कहना मुश्किल हो जाता है।

सीजफायर को लेकर भी असमंजस

विश्लेषकों का कहना है कि सीजफायर के बाद भी अमेरिकी नेतृत्व के भीतर स्पष्ट रणनीति दिखाई नहीं दे रही है। यह साफ नहीं है कि आगे कूटनीतिक समझौते की दिशा में बढ़ा जाएगा या फिर संघर्ष को आगे बढ़ाने का विकल्प रखा जाएगा। इसी कारण अमेरिकी सेना फिलहाल सावधानी से कदम उठा रही है और जल्दबाजी में किसी बड़े दावे से बच रही है।

युद्ध के चार बड़े लक्ष्य भी अधूरे

युद्ध शुरू होने के समय अमेरिका की तरफ से चार प्रमुख लक्ष्य बताए गए थे-

  • ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना ताकि वह भविष्य में परमाणु हथियार न बना सके।
  • ईरान में सत्ता परिवर्तन की स्थिति बनाना।
  • उसके मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करना।
  • तेल से जुड़े रणनीतिक ठिकानों पर नियंत्रण हासिल करना।

लेकिन लगभग 38 दिनों के संघर्ष के बाद भी इन चारों लक्ष्यों में से कोई भी पूरी तरह हासिल होता नहीं दिखा।

जनता का समर्थन भी नहीं मिला

युद्ध की रणनीति बनाते समय यह उम्मीद जताई जा रही थी कि ईरान के अंदर सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध देखने को मिलेगा और जनता अमेरिका के पक्ष में सड़कों पर उतर सकती है। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। ईरान के भीतर बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शन सामने नहीं आए, जिससे अमेरिका की रणनीति को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया।

क्यों सतर्क है अमेरिकी सेना

रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि यही वजह है कि अमेरिकी सेना इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सावधानी बरत रही है। सेना किसी भी जल्दबाजी में इसे “ऐतिहासिक जीत” बताने से बचना चाहती है, क्योंकि युद्ध के घोषित लक्ष्य अब तक हासिल नहीं हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस संघर्ष को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।

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