
Women Quota Bill 2026: 17 अप्रैल 2026 की देर रात लोकसभा में जिस विधेयक को लेकर उम्मीदें चरम पर थीं, उसका अंत एक बार फिर निराशा में हुआ। 33% महिला आरक्षण को संवैधानिक दर्जा देने वाला “संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026” और उससे जुड़े परिसीमन प्रस्ताव संसद के भीतर राजनीतिक सहमति की दीवार नहीं तोड़ पाए। मतदान में 298 सांसदों ने समर्थन किया, लेकिन 352 के आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से यह संख्या काफी कम रह गई। सरकार का दावा था कि यह प्रस्ताव पुराने विवादों का समाधान है-नई सीटों का विस्तार, 2011 जनगणना आधारित परिसीमन और 2029 से बिना किसी मौजूदा सांसद की सीट काटे महिलाओं के लिए आरक्षण। फिर भी विधेयक आगे नहीं बढ़ सका।
महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि महिला आरक्षण का विरोध विचारधारा से ज्यादा सत्ता संतुलन का सवाल रहा है। पंचायत स्तर पर महिलाओं के लिए आरक्षण स्वीकार किया गया क्योंकि वहां सत्ता का प्रभाव सीमित है। लेकिन संसद में 33% हिस्सेदारी राजनीतिक समीकरण बदल देती है-यही असली प्रतिरोध की जड़ है।
भारत में आज लाखों महिलाएं पंचायत, शिक्षा, प्रशासन और स्थानीय शासन में नेतृत्व कर रही हैं। कई राज्यों में पंचायतों में लगभग आधी सीटें महिलाओं के पास हैं। इसके बावजूद राष्ट्रीय राजनीति में उनकी हिस्सेदारी सीमित बनी हुई है। सरकारी योजनाओं-स्वच्छ भारत, उज्ज्वला योजना, जनधन और आवास योजनाओं-ने महिलाओं को सामाजिक रूप से मजबूत किया, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व अभी भी अधूरा है।
17 अप्रैल 2026 की रात ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि महिला आरक्षण सिर्फ कानून का मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा है। सवाल यह है कि क्या अगली बार संसद इस ऐतिहासिक अवसर को पूरा कर पाएगी, या यह सपना फिर किसी नई तारीख पर टल जाएगा।
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