कौन थे भारतीय फुटबॉल को स्वर्ण युग में ले जाने वाले समर 'बद्रू' बनर्जी, ओलंपिक में दिया था बेस्ट परफार्मेंस

Published : Aug 20, 2022, 02:29 PM ISTUpdated : Aug 20, 2022, 03:00 PM IST
कौन थे भारतीय फुटबॉल को स्वर्ण युग में ले जाने वाले समर 'बद्रू' बनर्जी, ओलंपिक में दिया था बेस्ट परफार्मेंस

सार

1956 के मेलबर्न ओलंपिक में देश ऐतिहासिक चौथे स्थान पर पहुंचाने वाले भारतीय फुटबाल टीम के पूर्व कप्तान समर 'बद्रू' बनर्जी का लंबी बीमारी के बाद शनिवार तड़के निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे। बनर्जी के परिवार में उनकी बहू हैं। 

कोलकाता. भारत के ओलंपिक स्टार फुटबॉल कैप्टन समर बनर्जी का 92 साल की उम्र में निधन हो गया है। 'बद्रू दा' के नाम से मशहूर समर बनर्जी अल्जाइमर, एजोटेमिया और हाई ब्लड प्रेशर की बीमारियों से जूझ रहे थे। बीते 27 जुलाई को वे कोविड पॉजिटीव भी पाए गए थे। तब उन्हें एमआर बांगुर हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। तबियत बिगड़ी तो राज्य के खेल मंत्री अरूप विश्वास के निर्देश पर एसएसकेएम हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां करीब 2.10 बजे उन्होने अंतिम सांस ली। 

भारतीय फुटबाल का गोल्डेन पीरियड
राज्य के खेल मंत्री ने कहा कि वह हमारे प्रिय 'बद्रू दा' थे और हमने उन्हें 2009 में मोहन बागान रत्न से नवाजा था। यह मैदान के लिए भी बड़ी क्षति है। उनके पार्थिव शरीर को क्लब में लाया गया और क्लब के सदस्यों और प्रशंसकों उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दी। भारतीय फुटबॉल टीमों ने अब तक तीन ओलंपिक में भाग लिया है और अब तक बनर्जी के नेतृत्व वाली 1956 की टीम का प्रदर्शन सबसे अच्छा बना हुआ है। तब वे कांस्य पदक के प्लेऑफ में बुल्गारिया से 0-3 से हारकर चौथे स्थान पर रही थी। उस समय को भारतीय फुटबॉल का गोल्डेन पीरियड माना जाता है। 

कौन थे समर बनर्जी
मोहन बागान को अपने पहले डूरंड कप (1953), रोवर्स कप (1955) सहित कई ट्रॉफियों में जीत दिलाने वाले समर बनर्जी बाद में हेड कोच भी रहे। उन्होंने दो संतोष ट्राफी जीती। उनके निधन से मैदान ने तीन साल से भी कम समय में पीके, चुन्नी गोस्वामी, सुभाष भौमिक और सुरजीत सेनगुप्ता के बाद एक और महान फुटबॉल खिलाड़ी खो दिया है। 30 जनवरी 1930 को जन्मे बनर्जी की फुटबॉल यात्रा की शुरुआत कुछ स्थानीय क्लबों से हुई थी। उनके पिता शशांक शेखर बनर्जी सख्त अनुशासक थे और चाहते थे कि वह डॉक्टर बनें। बनर्जी ने 'मोहन बागान रत्न' से सम्मानित होने के बाद एक वेबसाइट को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि मेरे पिता बहुत सख्त थे। उन्होंने कहा था कि वे जहां भी जाते तो मोहन बागान, ईस्ट बंगाल, मोहम्मडन स्पोर्टिंग और मैदान के कई अन्य क्लबों के बारे में बात करते हुए सुनते। कई बार उन्हें भगा दिया गया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 

18 की उम्र में बने फुटबॉलर
समर बनर्जी 18 की उम्र में फुटबॉलर बने और कलकत्ता फुटबॉल लीग में तीसरे डिवीजन क्लब बल्ली प्रोटिवा में शामिल हो गए। वहां से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा क्योंकि उन्हें बंगाल नागपुर रेलवे द्वारा शामिल किया गया था, जिसे बीएनआर के रूप में जाना जाता था। बनर्जी ने राजस्थान क्लब के खिलाफ एक विवादास्पद फाइनल में ग्रीन-एंड-मैरून ब्रिगेड के साथ अपने पहले सीजन में IFA शील्ड जीता। इसके बाद उन्होंने सेमीफाइनल और फाइनल में अपने प्रमुख स्ट्राइक के साथ क्लब को अगले सीजन में डूरंड कप में पहुंचाया। बनर्जी ने 1954 में फिर से मैदान की सुर्खियों में छा गए, जब उन्होंने सीएफएल और आईएफए शील्ड खिताब को हासिल किया। उनके कोच रहीम ने उनकी जगह भारतीय टीम में पक्की कराई। 1958 में उन्हें मोहन बागान का कप्तान बनाया गया।

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