
द्रास(कारगिल): 26 जुलाई को कारगिल युद्ध को 20 वर्ष पूरे हो चुके हैं। भारतीय सेना ने 26 जुलाई 1999 को पाकिस्तान को हराकर कारगिल युद्ध में अपनी जीत का परचम लहराया था। इस दिन को हर साल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। कारगिल की यह लड़ाई, करीब दो महीने तक चली थी जिसमें भारतीय सेना ने साहस का उदाहरण पेश किया था। इस जंग का हिस्सा रह चुके जवानों के जहन में आज भी इसकी यादें ताजा हैं। ऐसी ही याद को ताजा करने, बाप- बेटे कि एक जोड़ी करगिल जिले के द्रास कस्बे के लामोचन पहुंची। इन दोनों ने कारगिल का युद्ध न केवल साथ में लड़ा था, बल्कि गैलेंट्री अवॉर्ड भी प्राप्त किया था। लेफ्टिनेंट जनरल एएन औल, शायद इकलौते ऐसे कमांडर होंगे जिन्होंने अपने बेटे कर्नल अमित औल के साथ कारगिल की लड़ाई में हिस्सा लिया था। लेफ्टिनेंट जनरल ऑल युद्ध के दौरान 56 माउंटेन ब्रिगेड के कमांडर थे। वह वेस्टर्न कमांड के चीफ ऑफ स्टाफ के पद से रिटायर हुए हैं।
साथ में किया था जंग का नेतृत्व
लेफ्टिनेंट जनरल ऑल युद्ध के दौरान 56 माउंटेन ब्रिगेड के कमांडर थे। वह 56-माउंटेन ब्रिगेड का नेतृत्व कर रहे थे जिसने तोलोलिंग और टाइगर हिल पर कब्जा किया था और उनके बेटे अमित, उस समय 3/3 गोरखा राइफल्स के सेकेंड लेफ्टिनेंट थे और मारपो ला क्षेत्र से ऑपरेट कर रहे थे। दोनों को युद्ध में साहस के लिए गैलेंट्री अवार्ड दिए गए थे। इस दौरान दोनों की आपस में भी कोई बात चीत नहीं हुई थी और दोनों युद्ध खत्म होने के लगभग दो महीने बाद मिले थे। जनरल औल को उत्तम युद्ध सेवा मेडल (यूवाईएसएम) और अमित को सेना मेडल दिया गया है।
शहीदों के सम्मान में बनाया वॉर मेमोरियल
कारगिल वॉर मेमोरियल, टोलोलिंग हिल में द्रास में स्थित भारतीय सेना द्वारा बनाया गया एक युद्ध स्मारक है। यह स्मारक टाइगर हिल के पार शहर से लगभग 5 किमी दूर है। यह श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग 1D पर स्थित है। स्मारक भारतीय सेना के उन सैनिकों और अधिकारियों की याद में है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के संघर्ष के दौरान शहीद हो गए थे। पूरे स्मारक का मुख्य आकर्षण सैंडस्टोन की दीवार है, जिसमें सभी शहीद जवानों के नाम हैं।
वर्षों से, स्मारक में कई और बदलाव किए गए हैं। 26 जुलाई 2012 को, फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने मेमोरियल के लिए 30 मीटर (100 फीट) फ्लैग पोल पर 7.6 मीटर से 11.4 मापने वाला एक राष्ट्रीय ध्वज दिया था। कारगिल युद्ध स्मारक, एक महत्वपूर्ण स्थल है और पश्चिमी लद्दाख में एक प्रमुख टूरिस्ट आकर्षण है। माना जाता है कि 2016 में, लगभग 1,25,000 लोग स्मारक घूमने आए थे।
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