मेहनत है तो मुमकिन है....घर में नहीं थे खाने के पैसे फिर भी यहां के बच्चों ने गाड़ दिए झंडे, कर दिया ये कमाल

Published : Dec 13, 2022, 12:21 PM IST
मेहनत है तो मुमकिन है....घर में नहीं थे खाने के पैसे फिर भी यहां के बच्चों ने गाड़ दिए झंडे, कर दिया ये कमाल

सार

राजस्थान के इस परिवार के बच्चों ने जो कर दिखाया है वो सभी के लिए एक सीख लेने लायक है। जिस परिवार के पास खाने के लिए पैसे पूरे नहीं पड़ते हैं, वहां के बच्चो ने अपनी मेहनत से टफ एग्जाम में झंडे गाड़े। दोनो भाई बहन अब बनेंगे डॉक्टर।

नागौर (nagaur). परिवार को चलाने के लिए पिता पंचायत सहायक की नौकरी के साथ-साथ टेलरिंग का काम करते हैं। मां मनरेगा मजदूरी पर जाती है। पूरे दिन थकने के बाद भी दोनों पति पत्नी परिवार का खर्च भी ठीक से नहीं उठा पाते हैं। लेकिन अब से कुछ सालों बाद ही इस परिवार की जिंदगी बदलने वाली है। जब परिवार के दो सगे भाई बहन एक साथ डॉक्टर बनेंगे। इस परिवार के लिए यह सब होना एक आसान बात नहीं थी। परिवार ने पूरी उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन फिर एक लोकल एनजीओ ने इस परिवार का साथ दिया। जिसकी बदौलत अब नतीजा यह हुआ कि दंपत्ति के बेटे बेटी को सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल चुका है। फलक की बेटी का सिलेक्शन पहले ही हो गया। लेकिन बेटे का हाल ही में तीसरी काउंसलिंग में सिलेक्शन हुआ है।

पिता की मौत के बाद ठाना, बच्चों को बनाएंगे डॉक्टर
हम बात कर रहे हैं नागौर जिले के चेनार गांव के रहने वाले पंवार परिवार की। यहां के राजेश पवार ने बताया कि वह 6 हजार  प्रति महीने में पंचायत सहायक की नौकरी करते हैं। इसके अलावा खाली समय में टेलर का काम करते हैं। साल 1998 और 99 में वह दो बार 12वीं में फेल हो गए। महज एक साल बाद ही उनके पिता की भी मौत हो गई। अब परिवार के सामने रोटी का भी संकट खड़ा हो गया। इसके बाद उन्होंने कमाना शुरू कर दिया। फिर शादी हुई और बच्चे हो गए। लेकिन फिर राजेश ने सोच लिया कि चाहे कुछ भी हो मैं तो अपने पिता का अच्छे हॉस्पिटल में इलाज नहीं करवा पाया लेकिन मेरे इन दोनों बेटे . बेटी को डॉक्टर बनाऊंगा। साल 2012 में वापस से राजेश ने 12वीं की परीक्षा दी और पास हुए उसके बाद वह पंचायत सहायक की नौकरी लग गए। 

एनजीओ की मदद मिली, बच्चों ने मेहनत से पास की नीट
अब नौकरी लगने के बाद भी उनके लिए इतना आसान नहीं था कि दोनो बेटे - बेटी को पढ़ाई करवाई जा सके। ऐसे में उन्होंने अपने इलाके में ही काम करने वाले रूरल 21 एनजीओ से इस बारे में चर्चा की। जिसके बाद एनजीओ ने इन दोनों की पढ़ाई का बेड़ा उठाया। इस बार जब नीट परीक्षा का रिजल्ट आया तो परिवार में खुशी का माहौल हो गया। बेटी किरण को तो पहले ही प्रयास में कोटा मेडिकल कॉलेज मिल गया। लेकिन लड़के अनुभव के मार्क्स थोड़े कम थे। ऐसे में उसे काउंसलिंग के तीसरे राउंड में तेलंगाना के एक के सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिला है। पांच साल बाद दोनों डॉक्टर बन जाएंगे। ऐसे में जिस परिवार का घर खर्च भी ठीक से नहीं चलता हो वहां आलीशान मकान होगा और हर सुख सुविधा होगी।

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