
Dhundhiraj Chaturthi Vrat Katha Hindi Mai: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को ढुण्ढिराज चतुर्थी कहते हैं। इसे वरद और विनायकी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस बार ढुण्ढिराज चतुर्थी का व्रत 21 फरवरी, शनिवार को किया जाएगा। इस दिन कईं शुभ योग बन रहे हैं जिसके चलते इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है। इस व्रत से जुड़ी एक रोचक कथा भी है। मान्यता है कि उस कथा को सुने बिना इस व्रत का पूरा फल नहीं मिलता। आगे पढ़िए ये रोचक कथा…
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किसी समय भारक नाम के एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था। बचपन से ही वह हिंसा, चोरी व अन्य तरह के अपराधों में लिप्ट था जिसके कारण उसका ब्रह्मत्व भी नष्ट हो गया था। अपने शौक पूरे करने के लिए वह निर्दोषों की हत्या करने से भी चूकता नहीं था। ऐसा करते-करते बहुत समय बीत गया।
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एक दिन जब वह अधर्मी ब्राह्मण जंगल में घूम रहा था, तभी उसे एक व्यापारी वहां दिखाई देगा। लूटने के उद्देश्य से वह व्यापारी की ओर भागा। जब व्यापारी ने उसे देखा तो डर के कारण वह भी इधर-उधर भागने लगा और मदद के लिए जोर-जोर से चिल्लाने लगा। लेकिन निर्दयी ब्राह्मण ने उसे पकड़ लिया।
लेकिन तभी व्यापारी की आवाज सुनकर वहां 4 अन्य लोग आ गए। जब उन्होंने व्यापारी को उस अधर्मी के चंगुल में फंसा देखा तो उस ब्राह्मण को बंधक बनाकर सैनिकों को सौंप दिया। सैनिकों ने उसे बहुत पीटा तथा राजा के सामने पेश किया। राजा को उस उस दुष्ट के बारे में पता चला तो उन्होंने भी उसे प्रताड़ित करने का दंड दिया।
राजा के कहने पर सैनिकों ने उस ब्राह्मण को और पीटा और एक गड्डे में पटक किया। उस दिन फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी तिथि थी। दिन भर निराहार रहने से अंजाने में उससे व्रत हो गया और अगले दिन उसकी मृत्यु हो गयी। चतुर्थी व्रत के प्रभाव से मृत्यु होने पर श्रीगणेश के दूत उसे लेने आए और अपने साथ बैकुंठ को ले गए।
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