भारत में भी है एक 'मिनी ईरान', इस कांच के मंदिर में घुसते ही लगता है विदेश आ गए

Published : Mar 02, 2026, 07:53 PM IST
Indore Kanch Mandir

सार

ईरान और इराक में भले ही जंग चल रही हो और ईरान में अशांति का माहौल हो, लेकिन भारत में एक ऐसी जगह है जिसे आप 'मिनी ईरान' कह सकते हैं। अच्छी बात ये है कि यहां जंग का डर नहीं, बल्कि शांति और खूबसूरती है।

मध्य प्रदेश का इंदौर शहर अपने स्वाद और सफाई के लिए पूरे देश में मशहूर है। लेकिन इसी शहर में एक ऐसा मंदिर भी है, जिसे ‘मिनी ईरान’ कहा जाता है। यहां दाखिल होते ही ऐसा महसूस होता है, जैसे आप ईरान पहुंच गए हों। हुकुमचंद मार्ग पर बना यह कांच का मंदिर अपनी शानदार कारीगरी और अलग स्टाइल की वजह से "मिनी ईरान" के नाम से मशहूर हुआ है।

ईरानी कारीगरों का अनोखा मंदिर

इस मंदिर को 20वीं सदी की शुरुआत में शहर के बड़े उद्योगपति सेठ हुकुमचंद कासलीवाल ने बनवाया था। कहा जाता है कि इसे पूरा होने में करीब 11 साल लग गए। मंदिर में लगा ज्यादातर कांच बेल्जियम से मंगवाया गया था, लेकिन इसकी बारीक नक्काशी और डिजाइन ईरान समेत कई जगहों के कारीगरों ने की थी। मंदिर के इंटीरियर में फारसी स्टाइल साफ नजर आता है। यहां की बारीक नक्काशी, ज्यामितीय पैटर्न और दीवारों पर पड़ती रोशनी की झलकियां ईरानी महलों की याद दिलाती हैं।

छत पर बनी पेंटिंग्स का राज

इस कांच मंदिर की छत इसकी सबसे बड़ी खासियत है। कांच पर बड़ी-बड़ी पेंटिंग्स को बड़ी बारीकी से उकेरा गया है। जब इन पर रोशनी पड़ती है, तो पूरी छत तारों की तरह झिलमिला उठती है। पहली नजर में यकीन करना मुश्किल होता है कि यह कोई आम छत नहीं है। कहा जाता है कि छत की सजावट में जैन धर्म के प्रतीकों को भी बड़ी चतुराई से छिपाया गया है।

 

 

एक मूर्ति, हजारों अक्स

मंदिर के अंदर कांच के पैनल इस तरह से लगाए गए हैं कि एक ही मूर्ति की अनगिनत परछाइयां नजर आती हैं। यह नजारा आध्यात्मिक अनुभव को और भी गहरा बना देता है। ऐसा लगता है मानो एक ही सच, अनगिनत रूपों में दिखाई दे रहा हो। यह एक जैन मंदिर है, जहां भगवान महावीर स्वामी और दूसरे तीर्थंकरों की मूर्तियां स्थापित हैं। शीशों के जरिए उनकी परछाइयां भक्तों को दिव्यता का एक अलग ही एहसास कराती हैं।

बिना सीमेंट के बनी है इमारत

इस कांच मंदिर की एक और हैरान करने वाली बात यह है कि इसके निर्माण में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं हुआ है। इसे बनाने में चूने का इस्तेमाल किया गया था, जो उस समय का एक पारंपरिक और टिकाऊ तरीका था। मंदिर में पंखे या एसी भी नहीं हैं, फिर भी अंदर ठंडक रहती है। यह पारंपरिक बनावट का ही कमाल है, जिसकी वजह से यहां गर्मी नहीं लगती।

आज भी है आकर्षण का केंद्र

यह मंदिर सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक आम लोगों के लिए खुला रहता है और इंदौर आने वाले टूरिस्टों की लिस्ट में खास जगह रखता है। शाम के बाद खास धार्मिक अनुष्ठानों की वजह से टूरिस्टों का प्रवेश बंद कर दिया जाता है।

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