
Jitiya Vrat Story: इस बार जीवित्पुत्रिका व्रत व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को किया जाएगा। संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाने वाला यह व्रत माताओं के लिए खास माना जाता है। जितिया व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा के साथ उनकी कथा सुनने की भी परंपरा है। इस कथा में राजा जीमूतवाहन के त्याग और एक मां के बेटे को बचाने की कहानी बताई गई है। मान्यता है कि इसी घटना से जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा जुड़ी है। आइए जानते हैं जितिया व्रत की पूरी कथा…
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पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय राजा जीमूतवाहन अपने मित्र मित्रावसु के साथ समुद्र के किनारे स्थित वन में घूम रहे थे। इसी दौरान उन्हें एक युवक दिखाई दिया, जिसके पीछे एक बुजुर्ग महिला रोते हुए आ रही थी। महिला अपने बेटे की जिंदगी को लेकर बेहद परेशान थी।
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जीमूतवाहन ने युवक से उसकी परेशानी पूछी। तब युवक ने बताया कि उसका नाम शंखचूड़ है और वह नागकुल से है। उस दिन उसे गरुड़ के लिए भोजन बनने के लिए समुद्र किनारे स्थित एक शिला पर जाना था।
नागों और गरुड़ के बीच पुरानी दुश्मनी थी। इस वजह से नागराज वासुकि ने गरुड़ से एक समझौता किया था। इसके तहत रोज एक नाग को गरुड़ के भोजन के लिए भेजा जाता था। उस दिन शंखचूड़ की बारी थी। इसी कारण उसकी मां विलाप कर रही थी।
शंखचूड़ की बात सुनकर जीमूतवाहन का मन द्रवित हो गया। उन्होंने उसकी जान बचाने का फैसला किया। जीमूतवाहन ने शंखचूड़ से कहा कि वह अपनी जगह खुद गरुड़ का सामना करेंगे और उसे अपनी मां के पास रहने के लिए कहा।
इसके बाद शंखचूड़ के वहां से जाने पर जीमूतवाहन उस शिला पर जाकर बैठ गए। कुछ समय बाद गरुड़ वहां पहुंचे और जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने साथ ले गए। गरुड़ ने जब उन्हें घायल किया, तब भी जीमूतवाहन के चेहरे पर डर की जगह शांति बनी रही।
गरुड़ को कुछ संदेह हुआ। तभी शंखचूड़ भी वहां पहुंच गए और उन्होंने गरुड़ को बताया कि असली नाग वही हैं और जीमूतवाहन ने उनकी जगह खुद को बलिदान के लिए प्रस्तुत किया है।
यह जानकर गरुड़ को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्हें जीमूतवाहन के त्याग और दूसरों की रक्षा के लिए अपने प्राण देने की भावना से बहुत प्रभावित हुए। गरुड़ ने इसके बाद नागों को अपना भोजन न बनाने का संकल्प लिया।
कथा के अनुसार, जीमूतवाहन की पत्नी मलयवती की भक्ति और माता गौरी की कृपा से उन्हें नया जीवन मिला। इसके बाद गरुड़ ने अमृत की सहायता से पहले मारे जा चुके नागों को भी जीवित कर दिया। इस तरह नागों को गरुड़ के भय से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई।
मान्यता है कि जीमूतवाहन के इसी त्याग और संतान की रक्षा से जुड़ी कथा के कारण जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत में उनकी पूजा की जाती है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख और सुरक्षा की कामना से रखती हैं।
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