Uttarayan 2026: हमारे देश में मकर संक्रांति का पर्व अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, उत्तरायण भी इनमें से एक है। उत्तरायण उत्सव गुजरात में मनाने की परंपरा है। उत्तरायण का धार्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक महत्व भी है।
Uttarayana Facts: गुजरात में मकर संक्रांति का पर्व उत्तरायण के नाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग पतंग उड़ाते हैं, तिल-गुड़ के लड्डू खाते हैं। साथ ही इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने और जरूरतमंदों को दान देने का भी विशेष महत्व है। हर साल की तरह इस साल भी उत्तरायण 14 जनवरी को मनाया जाएगा। उत्तरायण का महत्व महाभारत में भी बताया गया है। उत्तरायण का न सिर्फ धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक महत्व भी है लेकिन इसके पीछे का साइंस बहुत कम लोगों को पता है। आगे जानिए उत्तरायण से जुड़ी खास बातें और इसका धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व…
विद्ववानों के अनुसार, सूर्य हर 30 दिन में राशि बदलता है। जब भी सूर्य एक राशि से निकलकर दूसरी राशि में जाता है तो इसे संक्रांति कहते हैं। सूर्य जब धनु राशि में प्रवेश करता है तो इसे धनु संक्रांति और जब मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति होती है। मकर संक्रांति से ही सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर गति करने लगती है, जिससे दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। इसी खुशी में उत्तरायण पर्व मनाया जाता है।
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को दो गति बताई गई है दक्षिणायन और उत्तरायण। सूर्य जब उत्तरी गोलार्द्ध से निकलकर दक्षिणी गोलार्द्ध की ओर गति करता है तो इसे दक्षिणायन कहते हैं और जब उत्तरी गोलार्द्ध की ओर गति करता है तो इसे उत्तरायण कहते हैं। उत्तरायण में दिन बड़े होते हैं, सूर्य की रोशनी अधिक समय तक पृथ्वी पर रहती है जिससे अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसलिए उत्तरायण का महत्व अधिक माना गया है।
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उत्तरायण का धार्मिक महत्व क्या है?
धर्म ग्रंथों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है। रात की अपेक्षा दिन का महत्व अधिक होता है, इसलिए उत्तरायण का महत्व दक्षिणायन से कहीं अधिक है। ऐसी भी मान्यता है कि उत्तरायण में जिसकी मृत्यु होती है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए भीष्म पितामह ने 58 दिन तक तीरों की शैया पर लेटकर उत्तरायण का इंतजार किया और इसके बाद ही अपने प्राणों का त्याग किया।
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उत्तरायण का वैज्ञानिक महत्व क्या है।
उत्तरायण का वैज्ञानिक महत्व भी है। उसके अनुसार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के बाद यानी उत्तरायण शुरू होते ही दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। दिन बड़े होने से पृथ्वी पर सूर्य की किरणें ज्यादा समय तक रहती है जिससे फसलें पकती हैं और बारिश के लिए अनुकूलता बनती है। इसी महत्व को समझते हुए हमारे ऋषि-मुनियों ने उत्तरायण पर्व मनाने की परंपरा शुरू की।
Disclaimer इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।
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