Pongal 2026: क्या है ‘पोंगल’ शब्द का अर्थ, कितने दिनों तक मनाते हैं ये पर्व? जानें रोचक कथा

Published : Jan 08, 2026, 10:16 AM IST

Pongal 2026: दक्षिण भारत में अनेक त्योहार मनाए जाते हैं, पोंगल भी इनमें से एक है। ये पर्व हर साल जनवरी में मनाया जाता है। ये त्योहार कईं दिनों तक मनाते हैं। इससे जुड़ी कईं मान्यताएं भी हैं जो इसे और भी खास बनाती हैं।

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जानें पोंगल से जुड़ी हर बात

Kab Hai Pongal 2026: हमारे देश में एक ही त्योहार अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। मकर संक्रांति भी इनमें से एक है। तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल के नाम से सेलिब्रेट किया जाता है। पोंगल शब्द का अर्थ है ऊफान या उबालना। पोंगल के दिन लोग दूध तब तक गर्म करते हैं जब तक कि वह उबलकर बाहर न आ जाए। लोग इसे सुख-समृद्धि का संकेत मानते हैं। तमिलनाडु में इसी दिन से नए साल की शुरूआत भी मानी जाती है, इसलिए इसका खास महत्व है। पोंगल से जुड़ी अनेक मान्यताएं और परंपराएं हैं। आगे जानिए पोंगल से जुड़ी खास बातें…


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कब से कब तक मनाएंगे पोंगल?

हर साल की तरह इस साल भी पोंगल उत्सव 14 जनवरी से शुरू होगा जो 4 दिनों तक मनाया जाएगा यानी 17 जनवरी तक। पोंगल के पहले दिन को भोगी पोंगल, दूसरे को सूर्य पोंगल, तीसरे को मट्टू पोंगल और चौथे को कानुम पोंगल कहते हैं। ये चारों दिन बहुत खास होते हैं। चारों ही दिन अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं।


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क्यों मनाते हैं पोंगल?

प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार शिवजी ने नंदी से कहा ‘ तुम धरती पर जाओ और लोगों से कहो कि सभी रोज तेल से स्नान करें और महीने में सिर्फ एक दिन भोजन करें।’ धरती तक आते-आते नंदी संदेश भूल गए और उन्होंने मनुष्यों से कहा ‘तुम रोज भोजन करो और महीने में एक दिन तेल से स्नान करो।’ इससे महादेव नाराज हो गए और नंदी से कहा ‘तुम पृथ्वी पर रहकर हल जोतोगे और साल में एक दिन लोग तुम्हारी पूजा भी करेंगे।’ इसलिए पोंगल के दौरान बैलों की पूजा भी की जाती है।

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सूर्यदेव का आभार मानने का पर्व है पोंगल

पोंगल उत्सव सूर्यदेव के प्रति आभार मानने का पर्व भी है। इस दिन लोग कच्चे दूध, गुड़ और चावल को उबालकर पोंगल नाम का व्यंजन बनाते हैं जिसका भोग सबसे पहले सूर्यदेव को लगाते हैं इसके बाद इसे प्रसाद के रूप में परिवार के लोग खाते हैं। पोंगल परंपरागत रूप से सूर्य के प्रकाश में ही पकाया जाता है और इसे केले के पत्ते पर खाया जाता है।

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जल्लीकट्टू के बिना अधूरा है पोंगल

पोंगल उत्सव जल्लीकट्टू के बिना अधूरा होता है। ये एक तरह का खेल है जिसमें बैल के सींग पर सिक्कों की पोटली बांध दी जाती है। जो व्यक्ति इस बैल पर काबू कर लेता है, उसे वो पोटली ईनाम में दी जाती है। जल्लीकट्टू शब्द कालीकट्टू से बना है। काली का अर्थ है सिक्का और कट्टू का अर्थ है बांधना। आज ये ये खेल पोंगल की पहचान बन चुका है।


Disclaimer
इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

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