
Kanha Ji Ki Chhathi Kab Hai: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के करीब छह दिन बाद कान्हाजी की छठी का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन लड्डू गोपाल की खास पूजा की जाती है और उन्हें कई तरह के पकवानों का भोग लगाया जाता है। गोकुल, वृंदावन समेत कई जगहों पर छठी उत्सव की खास रौनक देखने को मिलती है। आइए जानते हैं 2026 में श्रीकृष्ण की छठी कब मनाई जाएगी और पूजा का शुभ समय क्या रहेगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। जन्म के छह दिन बाद नंदबाबा और यशोदा मैया ने कान्हा की छठी मनाई थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। इस साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाई गई। ऐसे में जन्माष्टमी के छह दिन बाद 10 सितंबर 2026, गुरुवार को लड्डू गोपाल की छठी मनाई जाएगी। गोकुल और वृंदावन में इस दिन विशेष पूजा और आयोजन होते हैं।
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सुबह 10:51 से दोपहर 12:23 बजे तक
दोपहर 11:59 से 12:48 बजे तक अभिजीत मुहूर्त
दोपहर 12:23 से 1:55 बजे तक
दोपहर 1:55 से 3:28 बजे तक
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- छठी के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा की तैयारी करें। घर में किसी साफ जगह पर चौकी रखें। चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित करें।
- सबसे पहले पंचामृत से उनका अभिषेक करें। इसके बाद साफ पानी से कान्हा को स्नान करवाएं और नए वस्त्र पहनाएं। इसके बाद चंदन का तिलक लगाकर फूल और माला अर्पित करें।
- अब शुद्ध घी का दीपक जलाएं। इसके बाद रोली, अक्षत, अबीर और गुलाल आदि चीजें भगवान को अर्पित करें। श्रीकृष्ण की छठी पर कान्हाजी को कढ़ी-चावल का भोग लगाने की परंपरा है।
- पूजा के बाद भगनान लड्डू गोपाल की आरती करें और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा से पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली;
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक;
ललित छवि श्यामा प्यारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै;
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;
अतुल रति गोप कुमारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा;
बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;
चरन छवि श्रीबनवारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू;
हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद;
टेर सुन दीन भिखारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
Disclaimer
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