Mahakal Ujjain: ‘गलंतिका’ से होगा बाबा महाकाल का जलाभिषेक, मिलेगी गर्मी से राहत, क्या है ये परंपरा?

Published : Apr 03, 2026, 10:45 AM IST
Mahakal Ujjain

सार

mahakal ujjain mandir: 3 अप्रैल, शुक्रवार से वैशाख मास शुरू हो चुका है। इस दौरान भीषण गर्मी का प्रकोप रहेगा। गर्मी से राहत के लिए उज्जैन के महाकाल मंदिर में बाबा महाकालेश्वर का लगातार जलाभिषाक गलंतिका के माध्यम से होगा। 

mahakal mandir ujjain history: मध्य प्रदेश के उज्जैन में 12 में तीसरा ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर स्थित है। ये मंदिर अपने अंदर अनेक रहस्य समेटे हुए हैं। यहां की परंपरा भी काफी अलग है। पुरानी परंपरा के अंतर्गत वैशाख मास के पहले दिन यानी 3 अप्रैल को महाकाल ज्योतिर्लिंग के ऊपर गलंतिका बांधी गई, जिससे माध्मय से ज्येष्ठ मास के अंतिम दिन तक यानी 29 जून तक जलाभिषेक होता रहेगा। जानें क्या है ये परंपरा और इससे जुड़ी खास बातें…

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क्या होती है गलंतिका?

गलंतिका एक धातु की मटकी होती है, जिसके नीचे एक छोटा सा छेद होता है। इस छेद में निरंतर जलधारा निकलती रहती है, जिससे शिवलिंग का अभिषेक होता रहता है। महाकाल मंदिर में बाबा महाकाल के जलाभिषेक के लिए चांदी की गलंतिका का उपयोग किया जाता है। इस बार अधिक मास होने के कारण जलधारा अर्पण की अवधि एक माह अधिक रहेगी।

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गर्मी में क्यों लगाते हैं गलंतिका?

धर्म ग्रंथों के अनुसार वैशाख और ज्येष्ठ मास में भीषण गर्मी होती है। मान्यता है कि भगवान महादेव के गले में कालकूट विष के कारण गर्मी में उनके शरीर का ताप बहुत ज्यादा हो जाता है। इसी ताप को नियंत्रित करने के लिए ग्रीष्म ऋतु में शिवलिंग के ऊपर गलंतिका बांध दी जाती है जिससे लगातार जल की धारा बहती रहती है। इस जलाभिषेक से शिवजी को राहत मिलती है।

सुबह से शाम तक किया जाता है जलाभिषेक

परंपरा अनुसार महाकाल मंदिर में रोज भस्म आरती के बाद से जलाभिषेक का क्रम शुरू होता है जो शाम 5 बजे तक लगातार चलता रहता है। क्योंकि इसी समय गर्मी का प्रकोप सबसे ज्यादा रहता है। इस बार ज्येष्ठ का अधिक मास होने से लगातार तीन महीनों तक बाबा महाकाला का जलाभिषेक गलंतिका के माध्यम से किया जाएगा।

महाकाल की भस्मारती है विश्व प्रसिद्ध

बाबा महाकाल वैसे तो कईं वजहों से प्रसिद्ध हैं लेकिन यहां रोज सुबह की जाने वाली भस्मारती के चर्चे देश ही नहीं विदेश तक हैं। कहते हैं कि पहले मुर्दे की भस्म से बाबा महाकाल की आरती की जाती थी, लेकिन बाद में गाय के उपलों से बनी भस्म से भस्मारती की जाने लगी।

 

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