Mahakal Sawari: बाबा महाकाल ने 6 रूपों में दिए दर्शन, शाही ठाठ-बाट से निकली राजसी सवारी

Published : Sep 07, 2026, 03:29 PM ISTUpdated : Sep 08, 2026, 08:02 AM IST
Mahakal Sawari Live

सार

Mahakal Sawari Live Telecast: उज्जैन में बाबा महाकाल की राजसी सवारी 7 सितंबर, सोमवार को निकाली गई। इस सवारी में लाखों भक्तों ने बाबा महाकाल के 6 रूपों के दर्शन दिए।

Ujjain Mahakal Last Sawari Live: उज्जैन में स्थित भगवान महाकालेश्वर का मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। हर साल यहां सावन के सभी सोमवार और भाद्रपद के पहले 2 सोमवार को बाबा महाकाल की सवारी निकालने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि भगवान महाकाल सवारी के माध्यम से अपनी प्रजा का हाल जानने निकलते हैं। बाबा महाकाल की अंतिम सवारी को राजसी सवारी भी कहते हैं। इस बार राजसी सवारी 7 सितंबर, सोमवार को निकाली गई। 

6 रूपों में दर्शन दिए बाबा महाकाल ने

राजसी सवारी में बाबा महाकाल 6 अलग-अलग दिव्य रूपों में अपने भक्तों को दर्शन दिए। इस दौरान रजत पालकी में श्री चंद्रमौलेश्वर, हाथी पर मनमहेश, गरुड़ रथ पर शिवतांडव, नंदी रथ पर उमामहेश, दो अलग-अलग रथों पर होल्कर स्टेट का मुखारबिंद और सप्तधान मुखारबिंद शामिल थे।

ड्रोन से हुई फूलों की बारिश

बाबा महाकाल की सवारी में पहली बार ड्रोन से पुष्प वर्षा की गई। इसके लिए देश-विदेश की किस्मों के करीब 50 क्विंटल फूल मंगाए गए थे। शहनाई गेट पर गार्ड ऑफ ऑनर के दौरान पहली बार ड्रोन से पुष्पवर्षा हुई। इसके बाद शिप्रा तट और गोपाल मंदिर पर भी फूल बरसाए गए। सवारी में प्रदेश के अलग-अलग शहरों से आई करीब 70 मंडलियां भजन गाते हुए चल रही थीं।

भक्तों ने किया स्वागत

बाबा महाकाल की पालकी शाम 4 बजे मंदिर परिसर से बाहर निकली। सबसे पहले पुलिस बल द्वारा बाबा को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। बाबा महाकाल की पालकी विभिन्न मार्गो से होते हुए शिप्रा तट पहुंची। यहां सवारी का पूजन-अर्चन किया गया। वापसी में सवारी कार्तिक चोक, खाती समाज मंदिर, सत्यनारायण मंदिर, ढाबा रोड, टंकी चौराहा, छत्री चौक, गोपाल मंदिर होती हुई पुन: मंदिर में आई। इस दौरान लाखों भक्त बाबा महाकाल के दर्शन कर स्वयं को धन्य महूसस किया।

अंतिम सवारी को क्यों कहते हैं राजसी सवारी?

बाबा महाकाल की अंतिम सवारी भाद्रपद मास के दूसरे सोमवार को निकाली जाती है। इस सवारी में भगवान महाकाल अपने पूर्ण वैभव में दिखाई देते हैं। करीब 60 से 70 भजन मंडलिया, पुलिस बैंड, पुलिस अश्व दल व अनेक कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हुए चलते हैं। ऐसा लगता है कि मानों कोई राजा अपने सेना सहित नगर भ्रमण पर निकला हो। इसलिए बाबा महाकाल की अंतिम सवारी को राजसी सवारी भी कहते हैं।

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