महाशिवरात्रि पर जल चढ़ाते समय ये 5 गलतियाँ कर दीं तो शिव नाराज़ हो सकते हैं

Published : Feb 06, 2026, 05:39 PM IST

Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर जल चढ़ाने की सही विधि क्या है? किस दिशा में बैठकर, किस पात्र से और कौन-सा मंत्र जपना चाहिए? जानिए शिव पुराण व काशी परंपरा में बताए गए जलाभिषेक के नियम और आम गलतियाँ।

PREV
16
महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक की सही विधि: श्रद्धा, दिशा और पात्र का महत्व

महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शिव-तत्व को समझने और आत्मसमर्पण का अभ्यास करने का अवसर है। देशभर में करोड़ों श्रद्धालु इस दिन भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि अधिकतर लोग परंपरा निभा तो लेते हैं, पर उसकी सही विधि और भावार्थ से अनजान रहते हैं। शास्त्रों और काशी परंपरा में जलाभिषेक को लेकर जो नियम बताए गए हैं, उनका उद्देश्य दिखावा नहीं, बल्कि साधक की चेतना को सही दिशा में ले जाना है।

26
जलाभिषेक में पात्र का चयन क्यों अहम है

सबसे पहले उस पात्र की बात, जिससे जल अर्पित किया जाता है। शिवलिंग पर स्टील या लोहे के बर्तन से जल चढ़ाना शास्त्रीय रूप से उचित नहीं माना गया है। परंपरा में पीतल, तांबा या चांदी के पात्र को ही श्रेष्ठ बताया गया है। इन धातुओं को सात्त्विक माना गया है और माना जाता है कि ये साधक की भावना को शुद्ध रूप में शिव तक पहुंचाने में सहायक होती हैं।

36
दिशा और आसन: साधना का मौन अनुशासन

जलाभिषेक करते समय खड़े होकर जल अर्पित करना या पूर्व दिशा की ओर मुख करना एक सामान्य भूल है। शास्त्रों के अनुसार साधक को बैठकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके शिवलिंग पर जल चढ़ाना चाहिए। उत्तर दिशा को कुबेर और ज्ञान की दिशा माना गया है, जो शिव-साधना के अनुकूल मानी जाती है। बैठने की अवस्था साधक को स्थिरता और विनम्रता का बोध कराती है।

46
जल एक साथ नहीं, धारा में अर्पित करें

भगवान शिव को जालंधर या जलधारा प्रिय कहा गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि अधिक जल अर्पित करना ही भक्ति है, बल्कि धीरे-धीरे, निरंतर धारा के रूप में जल चढ़ाना ही सही विधि है। पूरा जल एक साथ उड़ेल देना भावनात्मक जल्दबाज़ी को दर्शाता है, जबकि धारा में अर्पण संयम और ध्यान का प्रतीक है।

56
मंत्र का महत्व: शब्द नहीं, चेतना

जलाभिषेक के समय मंत्रोच्चारण साधना को पूर्ण करता है। शिव-नमस्कार मंत्र का उच्चारण करते हुए जल अर्पित करना विशेष फलदायी माना गया है—

नमः शम्भवाय च मयोभवाय च।

नमः शंकराय च मयस्कराय च।

नमः शिवाय च शिवतराय च॥

हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि शिव मंत्रों के शब्दों से नहीं, बल्कि भाव और समर्पण से प्रसन्न होते हैं। यदि मंत्र शुद्ध उच्चारण के साथ न भी हो पाए, लेकिन भाव सच्चा हो, तो वह अर्पण स्वीकार्य होता है।

66
शिव जल नहीं, भाव स्वीकार करते हैं

शिवलिंग पर अर्पित जल वस्तुतः प्रतीक है। शिव स्वयं कहते हैं कि वे जल नहीं, बल्कि भक्त का अहंकार-त्याग और पूर्ण समर्पण स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि जलाभिषेक एक कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मिक प्रक्रिया है।

महाशिवरात्रि पर यदि हम विधि, दिशा, पात्र और भाव—इन चारों का ध्यान रखें, तो जलाभिषेक केवल परंपरा नहीं, बल्कि साधना बन जाता है। शिव को प्रसन्न करने के लिए बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि भीतर की शुद्धता आवश्यक है।

धार्मिक परंपराओं, मंदिरों, त्योहारों, यात्रा स्थलों और आध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ी खबरें पढ़ें। पूजा पद्धति, पौराणिक कथाएं और व्रत-त्योहार अपडेट्स के लिए Religion News in Hindi सेक्शन देखें — आस्था और संस्कृति पर सटीक और प्रेरक जानकारी।

Read more Photos on

Recommended Stories