
Nirjala Ekadashi Vrat Katha In Hindi: ज्येष्ठ मास मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं। इस बार ये एकादशी 25 जून, गुरुवार को है। धर्म ग्रंथों में इस एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा भी कहते हैं कि इस एक एकादशी का व्रत करने से पूरे साल की एकादशी का व्रत करने का फल मिलता है। इस व्रत की एक कथा भी है, जिसे सुने बिना इसका पूरा फल नहीं मिलता। आगे पढ़िए निर्जला एकादशी व्रत की रोचक कथा…
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एक बार महर्षि वेदव्यास हस्तिनापुर आए और उन्होंने पांडवों को एकादशी व्रत का महत्व बताया। उनकी बात सुनकर भीमसेन ने महर्षि व्यास से कहा, “हे पितामह! मेरे सभी भाई, माता कुंती और द्रौपदी एकादशी का व्रत रखते हैं। वे मुझे भी व्रत रखने के लिए कहते हैं, लेकिन मैं भूखा नहीं रह सकता। मैं भगवान की पूजा और दान तो कर सकता हूं, पर बिना भोजन के नहीं रह पाता।”
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व्यासजी ने कहा, “हे भीम! शास्त्रों में एकादशी के दिन अन्न न खाने का नियम बताया गया है। इससे मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।”
भीमसेन ने कहा, “मैं एक समय भी भोजन किए बिना नहीं रह सकता। यदि संभव हो तो मुझे ऐसा एक व्रत बताइए, जिसे करने से सभी एकादशियों का फल मिल जाए।”
तब व्यासजी ने कहा, “ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं। इस दिन सूर्योदय से अगले दिन तक बिना अन्न और जल के व्रत रखना चाहिए। जो व्यक्ति श्रद्धा से यह व्रत करता है, उसे वर्ष की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य मिलता है।”
व्यासजी ने बताया कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और "ऊं नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करना चाहिए। जरूरतमंदों को जल से भरा घड़ा, वस्त्र, अन्न, छाता आदि दान करना बहुत शुभ माना गया है। जो निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसके बड़े-बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
महर्षि वेदव्यास की बात सुनकर महाबली भीम ने निर्जला एकादशी भी विधि-विधान से ये व्रत करने लगे। उनके द्वारा ये व्रत करने से ही इस व्रत का नाम भीमसेनी एकादशी पड़ गया। धार्मिक मान्यता है कि जो पुरुष या स्त्री श्रद्धा और नियमपूर्वक यह व्रत करते हैं, उन्हें भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
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