Aja Ekadashi Vrat Katha: अजा एकादशी की कथा, इसे सुनने के बाद ही मिलेगा व्रत का पूरा फल

Published : Aug 18, 2025, 01:30 PM IST
aja ekadashi vrat katha

सार

Aja Ekadashi 2025: इस बार अजा एकादशी का व्रत 19 अगस्त, मंगलवार को किया जाएगा। इस दिन व्रत व पूजा करने के साथ-साथ इससे जुड़ी कथा भी जरूर सुननी चाहिए। बिना कथा सुने इस व्रत का पूरा फल नहीं मिलता।

Aja Ekadashi Vrat Katha In Hindi: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहते हैं। इसका एक अन्य नाम जया भी है। इस बार अजा एकादशी का व्रत 19 अगस्त, मंगलवार को किया जाएगा। इस व्रत का महत्व अनेक धर्म ग्रंथों में बताया गया है। इस एकादशी व्रत का पूरा फल तभी मिलता है जब उसकी कथा सुनी जाए। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्रत की कथा युधिष्ठिर को सुनाई थी। आगे आप भी पढ़ें अजा एकादशी की व्रत कथा…

अजा एकादशी की व्रत कथा (Aja Ekadashi Vrat Katha)

प्राचीन समय में हरिशचंद्र नाम का एक चक्रवर्ती राजा थे। वे अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करते थे और संतान की तरह उनकी रक्षा करते थे। राजा हरिशचंद्र सत्य बोलने के लिए भी प्रसिद्ध थे। एक बार किसी कारण वश उन्हें अपने राज्य को छोड़कर वन में जाकर रहना पड़ा।सिर्फ इतना ही नहीं अपने वचन को निभाने के लिए राजा हरिशचंद्र ने अपनी पत्नी को पुत्र सहित बेच दिया और स्वयं भी एक चाण्डाल के यहां सेवक बन गए।

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चाण्डाल ने उन्हें एक श्मशान घाट पर रहने का स्थान दिया और कहा कि ‘जो भी व्यक्ति यहां अपने परिजनों को जलाने आए तुम बिना उससे धन लिए उसका अंतिम संस्कार मत करने देना। इस तरह चाण्डाल की सेवा करते और श्मशान घाट में रहते हुए राजा हरिशचंद्र को अनेक वर्ष बीत गए। एक दिन राजा हरिशचंद्र श्मशान घाट पर बैठे-बैठे अपने उद्धार के बारे में सोच रहे थे, तभी गौतम ऋषि वहां आए।

गौतम ऋषि को आया देख राजा हरिशचंद्र ने तुरंत उनसे आशीर्वाद लिया और अपनी समस्या बताई। राजा हरिशचंद्र की बात सुनकर गौतम ऋषि ने कहा ‘भादौ मास के कृष्ण पक्ष में सभी का कल्याण करने वाली अजा एकादशी आती है, तुम उसका व्रत पूर्ण करो, इससे तुम्हारा कल्याण होगा। ऐसा कहकर गौतम ऋषि चले गए।

राजा हरिशचंद्र ने अजा एकादशी का विधि-विधान से व्रत किया। जैसे ही राजा हरिशचंद्र ने ये व्रत पूर्ण किया, आकाश से फूलों की बारिश होने लगी। इस व्रत के प्रभाव से राजा हरिशचंद्र को को अपना परिवार और राज-पाठ पुन: मिल गया और मृत्यु के बाद उन्हें स्वर्ग में स्थान मिला। इस व्रत की कथा स्वयं श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी।

 

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