Banke Bihari Temple: बांके बिहारी मंदिर में बार-बार क्यों डालते हैं भगवान की प्रतिमा के आगे पर्दा?

Published : Sep 06, 2023, 11:13 AM ISTUpdated : Sep 07, 2023, 08:41 AM IST
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सार

Banke Bihari Temple: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व वैसे तो पूरे देश में मनाया जाता है, लेकिन मथुरा के बांके बिहारी मंदिर में इसका उल्लास सबसे ज्यादा होता है। देश ही नहीं बल्कि विदेश से भी लाखों भक्त यहां दर्शन करने आते हैं।  

उज्जैन. वैसे तो हमारे देश में भगवान श्रीकृष्ण के अनेक प्रसिद्ध मंदिर हैं, लेकिन इन सभी में वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर (Banke Bihari Temple) का महत्व सबसे ज्यादा माना जाता है। कारण ये है कि वृंदावन में ही भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इस बार यहां जन्माष्टमी (Janmashtami 2023) महोत्सव 7 सितंबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। यहां रोज भक्तों की भीड़ उमड़ती है। इस मंदिर से जुड़ी कईं मान्यताएं और परंपराएं हैं, जो इसे और भी खास बनाती हैं। आज हम आपको बांके बिहारी मंदिर से जुड़ी ऐसी ही खास परंपरा के बारे में बता रहे हैं…

बार-बार डालते हैं कृष्ण प्रतिमा के सामने पर्दा (Banke Bihari Temple Traditions)
बांके बिहारी मंदिर से जुड़ी वैसे तो कईं परंपराएं हैं, लेकिन जो सबसे खास परंपरा है वो है यहां की पर्दा प्रथा। इस परंपरा के अनुसार, भगवान बांके बिहारी की प्रतिमा के आगे हर थोड़ी देर में पर्दा डाला जाता है और हटा दिया जाता है। यानी कोई भी भक्त एकटक भगवान की प्रतिमा को देख नहीं सकता। इस परंपरा से एक कथा भी जुड़ी है, जो बहुत रोचक है।

क्या है इस परंपरा से जुड़ी कथा? (Story Of Banke Bihari Temple)
कथा के अनुसार, एक बार बांके बिहारी मंदिर एक वृद्ध स्त्री आई जो विधवा और नि:संतान थी। जब उसने बांके बिहारी के दर्शन किए तो उनके सुंदर स्वरूप को देखती ही रही और उन्हें ही अपना पुत्र मान बैठीं। भगवान की सुंदर छवि देखकर वो अपने जीवन के सभी दुख-दर्द भूल गई।
उस महिला के मन में प्रेम और ममत्व का भाव देख स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी खुद को उनका पुत्र मानने से नहीं रोक पाए और वृद्धा के साथ-साथ उसके घर चले गए। अगले दिन जब मंदिर का दरवाजा खुला तो वहां बांके बिहारी को न पाकर पुजारियों ने उनकी खोज करना शुरू की और उन्हें ढूंढते-ढूंढते वे वृद्धा के घर तक पहुंच गए।
पुजारियों ने भगवान बांके बिहारी से वापस मंदिर चलने के लिए बहुत विनती की, तब कहीं जाकर भगवान मंदिर में लौटकर आए। तभी से हर 2 मिनट बाद भगवान की प्रतिमा के आगे पर्दा डालने की परंपरा की शुरुआत हुई। ताकि कोई भी एकटक भगवान को निहार न सके।


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