
Budhi Diwali 2025: देशभर में दिवाली का उत्सव और खुशियां बीत चुकी हैं, लेकिन एक राज्य ऐसा भी है जहां दिवाली के एक महीने बाद भी "बूढ़ी दिवाली" मनाने की परंपरा जारी है। यह राज्य है हिमाचल प्रदेश। यह राज्य अपनी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां दिवाली एक अनोखे रूप में मनाई जाती है, जिसे बूढ़ी दिवाली कहते हैं।
राज्य के सिरमौर ज़िले के शिलाई और कुल्लू ज़िले के निरमंड क्षेत्र में दिवाली के एक महीने बाद बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। इस साल बूढ़ी दिवाली 20 नवंबर से शुरू होगी और तीन-चार दिनों तक मनाई जाएगी। लेकिन हिमाचल प्रदेश में बूढ़ी दिवाली क्यों मनाई जाती है? आइए जानें इसका कारण।
सिरमौर के शिलाई में मान्यता है कि जब भगवान श्री राम लंका के राजा रावण का वध करके और 14 वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे, तो यह खबर पूरे देश में फैल गई। हालांकि, पहाड़ी इलाकों में भगवान राम के अयोध्या लौटने की खबर देर से पहुंची। इसीलिए यहां दिवाली एक महीने बाद मनाई जाने लगी। इस शुभ अवसर पर विवाहित बेटियों और रिश्तेदारों को घर आमंत्रित किया जाता है।
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कुल्लू जिले के निरमंड क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली भगवान परशुराम से जुड़ी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने यहां एक राक्षस का वध किया था और लोगों ने मशालें जलाकर जश्न मनाया था। हर साल बूढ़ी दिवाली पर रस्साकशी और पारंपरिक लोकगीतों के साथ मशाल जुलूस निकाला जाता है।
यह राक्षस वृत्तासुर के वध से भी जुड़ा है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान इंद्र ने महर्षि दधीचि की हड्डियों से बने एक हथियार से वृत्तासुर का वध किया था। इंद्र की विजय पर, लोगों ने मार्गशीर्ष अमावस्या की रात को मशालें जलाईं और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया। बूढ़ी दिवाली पर पारंपरिक नृत्य किए जाते हैं और लोकगीत गाए जाते हैं। बूढ़ी दिवाली पर स्थानीय लोग नाटी, रास, विरह गीत, भय्यूरी, परोकाड़िया गीत, स्वांग और हुड़क नृत्य करते हैं। इस दौरान मुदा, शाकुली, चिड़वा और अखरोट जैसे पारंपरिक व्यंजन एक-दूसरे को बांटे जाते हैं और शुभकामनाएं दी जाती हैं।
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