
Kedarnath Temple interesting Facts: उत्तराखंड के देवभूमि भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है देवताओं का घर। यहां अनेक प्राचीन मंदिर हैं, इनमें से केदारनाथ भी एक है। ये मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। साथ ही ये उत्तराखंड के 4 धामों में भी प्रमुख है। हर साल यहां अक्षय तृतीया से चार धाम यात्रा शुरू होती है। इस बार ये यात्रा 10 मई, शुक्रवार से शुरू हो चुकी है। इस दिन सबसे पहले केदारनाथ मंदिर का कपाट खोला गया है। केदारनाथ मंदिर से कईं कथाएं और मान्यताएं जुड़ी हैं जो इसे और भी खास बनती हैं। आगे जानिए इस मंदिर से जुड़ी रहस्यमयी बातें…
किसने की यहां शिवलिंग की स्थापना?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, युद्ध में अपने ही परिजनों की हत्या करने के पाप से मुक्त होने पांडव यहां शिवजी के दर्शन करने आए थे। लेकिन शिवजी उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बैल का रूप धारण कर लिया। भीम ने शिवजी को पहचान लिया और उन्हें पकड़ने के लिए दौड़े। लेकिन भीम के हाथ में सिर्फ बैल (शिवजी) के पृष्ठ भाग यानी पीठ का हिस्सा ही आया। बाद ही भविष्यवाणी हुई कि ‘मेरे जिस पृष्ठ भाग को भीम ने पकड़ा है, उसी को शिला रूप में स्थापित कर पूजा करो।’ पांडवों ने ऐसा ही किया। इसे ही केदारनाथ के रूप में कालांतर में पूजा जाने लगा।
शंकराचार्य ने दी नई पहचान
कालांतर में ये मंदिर बर्फ में काफी समय तक दबा रहा। तब आदि गुरु शंकराचार्य देश का भ्रमण करते हुए यहां पहुंचें तो उन्होंने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। आदि गुरु शंकाराचार्य ने यहां तपस्या भी की। मंदिर के पास ही शंकराचार्य का समाधि स्थल भी है। यहां इनकी विशाल प्रतिमा भी स्थापित की गई है।
कन्नड़ भाषा में होती है पूजा
केदारनाथ मंदिर की खास बात ये है कि यहां जो भी पूजा-अनुष्ठान आदि होती हैं, वो कन्नड़ भाषा में होती हैं। यहां के मुख्य पुजारी को रावल कहा जाता है, वे कर्नाटक के वीरा शैव जंगम समुदाय के होते हैं। हजारों सालों से इसी समुदाय के लोग केदारनाथ मंदिर की सेवा में लगे हुए हैं।
6 महीने बंद रहता है मंदिर
केदारनाथ मंदिर ऐसे स्थान पर जहां शीत ऋतु के दौरान किसी का भी पहुंचना असंभव होता है, इसलिए इस दौरान इस मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। ये समय दीपावली के लगभग आता है। इसके बाद ग्रीष्म ऋतु आने पर अक्षय तृतीया के दिन केदारनाथ मंदिर के कपाट पुन: खोल दिए जाते हैं। शीत ऋतु के दौरान भगवान केदारनाथ को पालकी से उखीमठ ले जाया जाता है। 6 महीने तक भोलेनाथ के दर्शन उखीमठ में ही होते हैं।
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