
Santan Saptami Vrat Katha In Hindi: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी की व्रत किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से नि:संतान दंपत्ति को योग्य संतान की प्राप्ति होती है, वहीं जिन लोगों की पहले से संतान है, उनकी आयु लंबी होती है। इस व्रत की कथा भी बहुत रोचक है, जो स्वयं भगवन श्रीकृष्ण ने महाराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। जो भी महिला संतान सप्तमी का व्रत करती है, उसके लिए ये कथा सुननी भी जरूरी है। आगे पढ़ें संतान सप्तमी व्रत की कथा…
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एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि ‘हे भगवन! क्या ऐस कोई उत्तम व्रत नहीं है, जिसके करने से मनुष्य के दुःख दूर होकर वह पुत्र एवं पौत्रवान हो जाए।’
युधिष्ठिर की बात सुनकर श्रीकृष्ण ने उन्हें संतान सप्तमी व्रत की कथा सुनाई और कहा ‘किसी समय अयोध्या पर राजा नहुष का शासन था। वे अत्यंत न्यायप्रिय और पराक्रमी राजा थे। राजा नहुष की पत्नी का नाम चंद्रवती थी। रानी की एक प्रिय सहेली भी थी, जिसका नाम रूपवती था।’
‘एक दिन रानी चंद्रवती और उनकी सहेली रूपवती नदी स्नान करने गईं। वहां उन्होंने देखा कि बहुत-सी महिलाएं पूजा कर रही हैं। जब उन दोनों ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि वे संतान सप्तमी की पूजा कर रही हैं।’
‘ये देख रानी और उनकी सहेली ने भी संतान सप्तमी का व्रत करने का संकल्प लिया। रूपवती ने तो ये व्रत किया लेकिन रानी चंद्रवती ये व्रत करना भूल गईं। अगले जन्म में रानी वानरी और ब्राह्मणी मुर्गी बनी। मुर्गी की योनि में भी ब्राह्मणी भगवान शिव और देवी पार्वती का ध्यान करती थी।’
‘इसके बाद उन्हें पुन: मानव योनि में जन्म मिला। इस बार रानी चंद्रमुखी मथुरा के राजा की रानी बनी और रूपवती पुन: ब्राह्मणी। इस जन्म में भी वे दोनों सहेलियां थीं। ब्राह्मणी ने इस जन्म में संतान सप्तमी का व्रत किया, जिससे उसे आठ संतान हुई।’
‘रानी ने इस जन्म में भी संतान सप्तमी का व्रत नहीं किया, जिसके कारण उसे कोई संतान नहीं हुई। ब्राह्मणी को अपने पुनर्जन्म की बातें याद थी। उसने वो बातें जाकर रानी को बताई। रानी ने भी संतान सप्तमी का व्रत किया, जिससे उसे भी योग्य संतान की प्राप्ति हुई।
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