Kurma Jayanti 2024: कब है कूर्म जयंती, 22 या 23 मई? जानें पूजा विधि, मंत्र, कथा और आरती सहित पूरी डिटेल

Published : May 20, 2024, 11:08 AM IST
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सार

Kurma Jayanti 2024 Kab Hai: भगवान विष्णु ने देवताओं की सहायता के लिए कई बार अवतार लिए, कूर्म अवतार भी इनमें से एक है। इस अवतार में भगवान विष्णु ने एक कछुए का रूप धारण किया था। 

हर साल वैशाख पूर्णिमा पर कूर्म जयंती का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी तिथि पर भगवान विष्णु ने कूर्म यानी कछुए का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी। इस बार ये पर्व कब मनाया जाएगा, इसे लेकर कन्फ्यूजन है क्योंकि वैशाख पूर्णिमा तिथि 1 नहीं बल्कि 2 दिन है। आग जानिए कब है कूर्म जयंती, पूजा विधि, कथा सहित पूरी डिटेल…

कब है कूर्म जयंती 2024?
पंचांग के अनुसार, वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि 22 मई, बुधवार की शाम 06 बजकर 48 मिनिट से शुरू होगी, जो अगले दिन यानी 23 मई, गुरुवार की शाम 07 बजकर 22 मिनिट तक रहेगी। इस तरह वैशाख मास की पूर्णिमा का संयोग 2 दिन बन रहा है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. प्रवीण द्विवेदी के अनुसार, चूंकि पूर्णिमा तिथि का सूर्योदय 23 मई, गुरुवार को होगा, इसलिए इसी दिन कूर्म जयंती का पर्व मनाया जाएगा।

इस विधि से करें पूजा
- 23 मई, गुरुवार की सुबह जल्दी उठकर हाथ में जल-चावल लेकर व्रत-पूजा का संकल्प लें। दिन भर व्रत के नियमों का पालन करें।
- शाम को शुभ मुहूर्त में घर की पूर्व दिशा में तांबे के कलश में पानी, दूध, तिल, गुड़ फूल और चावल मिलाकर कलश स्थापित करें
- इसके पास ही भगवान विष्णु के कूर्म अवतार का चित्र या प्रतिमा स्थापित कर पूजा करें। भगवान को कुमकुम से तिलक लगाएं।
- इसके बाद दीपक जलाएं। सिंदूर और लाल फूल चढ़ाएं। अंत में रेवड़ियों का भोग लगाएं तथा नीचे लिखे इस मंत्र का जाप करें-
ऊं आं ह्रीं क्रों कूर्मासनाय नम:॥
- अंत में आरती करें और भगवान कूर्म से अपनी इच्छा पूर्ति के लिए वरदान मांगे। इस तरह कूर्म जयंती का पर्व मनाएं।

भगवान विष्णु ने क्यों लिया कूर्म अवतार?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब दैत्यों और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन करने की ठानी तो इसके लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। जैसे ही मदरांचल पर्वत को समुद्र के बीच ले जाया गया तो वो डूबने लगा। तभी भगवान विष्णु ने विशाल कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर मदरांचल पर्वत को अपनी पीठ पर स्थित कर लिया, जिससे वो समुद्र में स्थित हो गया। इस तरह मदरांचल पर्वत नेती की सहायता से तेजी से घूमने लगा और समुद्र मंथन का कार्य पूरा हो सका।


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इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो ज्योतिषियों द्वारा बताई गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

 

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