इस नदी के पानी को छूने से भी क्यों कांपते हैं लोग?

Published : Oct 22, 2024, 06:21 PM ISTUpdated : Oct 22, 2024, 06:22 PM IST
इस नदी के पानी को छूने से भी क्यों कांपते हैं लोग?

सार

बहते पानी में नहाने से पाप धुल जाते हैं, ऐसा माना जाता है। खासकर कुछ पवित्र नदियों की पूजा रोज होती है। लेकिन भारत में एक ऐसी नदी भी है जिसे छूने से लोग डरते हैं। इसकी वजह जानिए।   

नदियों का देश भारत (India) है। गंगा, यमुना, नर्मदा, सिंधु, कावेरी, भारत में बहने वाली नदियों की सूची बहुत लंबी है। यहाँ लोग नदियों को देवता मानते हैं, उनकी पूजा करते हैं। नदी में नहाने को पुण्य स्नान (holy bath) माना जाता है। गंगा, कावेरी समेत कई नदियों में स्नान करने से पाप कटते हैं और पुण्य मिलता है, ऐसा माना जाता है। गंगा जल को घर लाकर पूजा जाता है। भारत में सिर्फ़ पवित्र नदियाँ ही नहीं, एक नदी ऐसी भी है जिसे अपवित्र माना जाता है। उस नदी में नहाना तो दूर, लोग उसके पास जाने से भी डरते हैं। 

शापित नदी (Cursed river)

इस अपवित्र नदी का नाम कर्मनाशा (karmanasha) है। यह नदी बिहार के कैमूर ज़िले से निकलकर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, चंदौली, वाराणसी, गाज़ीपुर ज़िलों से होकर बहती है। बक्सर में यह गंगा में मिलकर पवित्र हो जाती है। कर्मनाशा नाम दो शब्दों से बना है - कर्म और नाश। कर्म यानी हम जो काम करते हैं और नाश यानी नष्ट होना। इस नदी का मतलब है कि आप कितना भी अच्छा काम करें, यह नदी उसे नष्ट कर देगी। 

कर्मनाशा नदी शापित है। इसलिए इस नदी में नहाना और इसका पानी इस्तेमाल करना पाप माना जाता है। इससे किए गए सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं, ऐसा लोग मानते हैं। नदी के शापित होने की वजह से लोग इसका पानी छूते तक नहीं हैं। 

कर्मनाशा नदी को श्राप कैसे मिला ?

इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। राजा हरिश्चंद्र (Harishchandra) के पिता राजा सत्यव्रत (king Satyavrata) ने, जीवित स्वर्ग जाने की इच्छा गुरु वशिष्ठ से ज़ाहिर की। लेकिन वशिष्ठ जी ने मना कर दिया। तब सत्यव्रत ने यह बात विश्वामित्र को बताई। वशिष्ठ से द्वेष के कारण विश्वामित्र ने इसे मान लिया और अपनी शक्ति से सत्यव्रत को स्वर्ग भेज दिया। लेकिन क्रोधित इंद्र ने सत्यव्रत को उल्टा लटकाकर वापस भेज दिया। हार न मानने वाले विश्वामित्र ने सत्यव्रत को स्वर्ग और धरती के बीच लटका दिया। सत्यव्रत त्रिशंकु की स्थिति में आ गए। उल्टे लटके सत्यव्रत के मुँह से लार टपकने लगी, जो धरती पर नदी बन गई। इसी समय वशिष्ठ ने राजा को चांडाल होने का श्राप दे दिया। इसलिए सत्यव्रत की लार से बनी नदी को शापित नदी कहा जाता है। बिहार के लोगों के लिए यह नदी सिर्फ़ कहानी में ही नहीं, हक़ीक़त में भी श्राप है। बारिश में यह नदी उफान पर आकर तबाही मचाती है। 

कर्मनाशा नदी से होने वाला नुकसान

लोगों का मानना है कि कर्मनाशा नदी के पानी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसमें नहाने, इसे छूने से व्यापार में नुकसान होता है, कामों में बाधा आती है, और बरसों की पूजा-अर्चना बेकार जाती है। इसलिए वहाँ के लोग इस नदी के पानी से दूर रहते हैं। 

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