
Vat Savitri Vrat 2026 Date: धर्म ग्रंथों में ज्येष्ठ मास की अमावस्या का विशेष महत्व बताया गया है क्योंकि इसी दिन वट सावित्री व्रत किया जाता है। महिलाओं को इस व्रत का विशेष रूप से इंतजार रहता है। मान्यता है इस व्रत को करने से पति की सेहत ठीक रहती है और उसकी उम्र भी बढ़ती है, साथ ही घर-परिवार में भी सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस व्रत की शुरूआत ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी तिथि से होती है। मुख्य पूजा अमावस्या तिथि पर की जाती है। जानें इस बार कब करें वट सावित्री व्रत, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त आदि डिटेल…
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार, इस बार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 14 मई, गुरुवार को है, इसलिए इसी दिन से वट सावित्री व्रत की शुरूआत होगी। वहीं ज्येष्ठ अमावस्या तिथि यानी 16 मई, शनिवार को मुख्य पूजा की जाएगी।
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वैसे तो वट सावित्री व्रत की पूजा पूरे दिन की जा सकती है लेकिन अगर ये काम मुहूर्त देखकर किया जाए तो और भी शुभ फल मिलते हैं। 16 मई के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं-
- दोपहर 11:56 से 12:49 तक (अभिजीत मुहूर्त)
- सुबह 07:27 से 09:06 तक
- दोपहर 12:23 से 02:01 तक
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- 16 मई, शनिवार की सुबह स्नान आदि करने के बाद हाथ में जल, चावल और फूल लेकर व्रत-पूजा का संकल्प लें। मन में कोई बुरा विचार न लाएं। शुभ मुहूर्त से पहले पूरी पूजन सामग्री एक स्थान पर एकत्रित कर लें।
- पूजा के लिए एक टोकरी में 7 प्रकार का अनाज रखें और इसके ऊपर ब्रह्मा-सावित्री की प्रतिमा या चित्र रखकर बरगद के पेड़ के नीचे इनकी पूजा करें। इनके साथ शिव-पार्वती, यमराज और सावित्री-सत्यवान की पूजा भी करें।
- नीचे लिखा मंत्र बोलकर देवी सावित्री को जल से अर्घ्य दें-
अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्ध्यं नमोस्तुते।।
- बरगद के पेड़ पर जल चढ़ाएं और मंत्र बोलें-
वट सिंचामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमै:।
यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोसि त्वं महीतले।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैस्च सम्पन्नं कुरु मां सदा।।
- इसके बाद बरगद के पेड़ पर कच्चा सूत लपेटते हुए 11 परिक्रमा करें। आरती करें और उसी स्थान पर बैठकर सावित्री-सत्यवान की कथा भी सुनें। इसके बाद अपने परिवार की बुजुर्ग महिलाओं का आशीर्वाद भी जरूर लें।
धर्म ग्रंथों के अनुसार, प्राचीन समय में अश्वपति नाम के एक राजा थे। उनकी पुत्री का नाम सावित्री था, वह सर्वगुण संपन्न थी। सावित्री का विवाह राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से हुआ। लेकिन शत्रुओं द्वारा हारए जाने के कारण राजा द्युमत्सेन जंगल में अपने परिवार के साथ रहते थे।
विवाह से पहले से नारद मुनि ने सावित्री को बता दिया था कि सत्यवान की आयु बहुत कम है। इसके बाद भी सत्यवती ने सत्यवान से ही विवाह करना स्वीकार किया। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु होने वाली थी, उस दिन सावित्री भी अपने पति सत्यवान के साथ जंगल में गई।
जंगल में लकड़ी काटते-काटते सत्यवान की मृत्यु हो गई और यमराज उसके प्राण निकालकर ले जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे यमलोक की ओर चल पड़ी। सावित्री के पतिव्रत को देख यमराज ने उसे कईं वरदान दिए और आखिरकार सत्यवान के प्राण भी छोड़ने पड़े।
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