
Vijaya Dashami 2026: इस बार दुर्गा पूजा की दशमी तिथि, जिसे विजयादशमी और दशहरा भी कहा जाता है 20 अक्टूबर 2026, दिन शनिवार को है। इसी दिन मां दुर्गा को विदाई देने और दुर्गा विसर्जन करने की परंपरा निभाई जाती है। दुर्गा पूजा खत्म होने के साथ ही बंगाल में एक बार फिर सुनाई देने लगते हैं तीन खास शब्द- ‘आसछे बोछोर आबार होबे’। हिंदी में इसका मतलब है, ‘अगले साल फिर होगा।’ सुनने में यह एक साधारण वाक्य लगता है, लेकिन बंगाली समाज के लिए इसमें मां दुर्गा की विदाई का दुख, उनके दोबारा आने की उम्मीद और अपनों के साथ त्योहार मनाने की खुशी, तीनों छिपे हैं। विजयादशमी के दिन जब मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के लिए ले जाई जाती है, तब यही शब्द विदाई को एक नई शुरुआत की उम्मीद से जोड़ देते हैं। जानिए ‘आसछे बोछोर आबार होबे’ का मतलब और विजयादशमी पर क्यों कहा जाता है।
बंगाली भाषा के इस वाक्यांश का अर्थ है- अगले साल फिर होगा। दुर्गा पूजा के संदर्भ में यह मां दुर्गा के अगले साल दोबारा आगमन की कामना को जाहिर करता है। यह केवल त्योहार के लौटने की बात नहीं, बल्कि उस आस्था और परंपरा का प्रतीक भी है, जो पीढ़ियों से बंगाली परिवारों को जोड़ती आई है।
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बंगाली परंपरा में मां दुर्गा को उमा के रूप में भी देखा जाता है, जो अपने बच्चों के साथ मायके आती हैं। दुर्गा पूजा के दौरान उनका आगमन घर में बेटी के आने जैसी खुशी लेकर आता है। वहीं, विजयादशमी पर उनकी विदाई परिवार से बेटी के लौटने जैसी भावुक घड़ी बन जाती है। इसी दिन दुर्गा विसर्जन की रस्म निभाई जाती है। श्रद्धालु पूजा-अर्चना के बाद मां को विदा करते हैं और अगले साल फिर उनके स्वागत की कामना करते हैं। कई समुदायों में विदाई से पहले सिंदूर खेला भी होता है, जिसमें महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को लगाती हैं। हालांकि, इन रस्मों के तरीके अलग-अलग जगहों पर भिन्न हो सकते हैं।
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दुर्गा पूजा बंगाल में सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि परिवार, दोस्तों और समुदाय के साथ जुड़ने का बड़ा अवसर भी है। पंडालों की रौनक, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक खानपान और अपनों से मुलाकात की यादें त्योहार के खत्म होने के बाद भी बनी रहती हैं। ऐसे में ‘आसछे बोछोर आबार होबे’ विदाई के दुख को अगले मिलन की उम्मीद में बदल देता है। मां दुर्गा की प्रतिमा भले ही विसर्जित हो जाए, लेकिन उनके प्रति श्रद्धा बनी रहती है। यही वजह है कि विजयादशमी पर बोला जाने वाला यह वाक्य केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भरोसे और भावनाओं का प्रतीक है। मां की विदाई के साथ ही अगले साल उनके स्वागत की उलटी गिनती भी शुरू हो जाती है।
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