
Sankarshan Chaturthi Vrat Kab Kare: वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की विनायकी चतुर्थी को संकर्षण चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस चतुर्थी का महत्व अनेक धर्म ग्रंथों में बताया गया है। संकर्षण भगवान बलराम यानी शेषनाग का भी एक नाम है। इस व्रत में पहले भगवान श्रीगणेश की और चंद्रोदय होने पर चंद्रमा की पूजा की जाती है। इस बार संकषर्ण विनायकी चतुर्थी का व्रत 20 अप्रैल, सोमवार को किया जाएगा। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. प्रवीण द्विवेदी से जानिए, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त आदि की डिटेल…
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संकर्षण विनायकी चतुर्थी पर भगवान श्रीगणेश की पूजा का समय सुबह 11 बजकर 02 मिनिट से दोपहर 01 बजकर 38 तक रहेगा। यानी पूजा के लिए भक्तों को पूरे 02 घण्टे 36 मिनट का समय मिलेगा। इस दिन चंद्रमा के दर्शन रात 10 बजकर 20 मिनिट के बाद करें। चंद्रमा के दर्शन के बाद ही भोजन करें।
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- 20 अप्रैल, सोमवार की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद शुभ मुहूर्त में भगवान श्रीगणेश की पूजा करें।
- श्रीगणेश की प्रतिमा या चित्र साफ स्थान पर स्थापित करें। सबसे पहले फूलों की माला पहनाएं और दीपक जलाएं।
- मस्तक पर तिलक भी लगाएं। इसके बाद जनेऊ, अबीर, गुलाल, रोली, दूर्वा, चावल आदि चीजें एक-एक कर चढ़ाएं।
- पूजा करते समय ऊं गं गणपतये नम: मंत्र का जाप मन ही मन में करते रहें। भगवान को इच्छा अनुसार भोग लगाएं।
- इसके बाद परिवार सहित भगवान श्रीगणेश की आरती उतारें। चंद्रमा उदय होने पर इसकी भी पूजा करें।
- इस तरह पूजा के बाद स्वयं भोजन करें। इस व्रत के प्रभाव से आपके घर में सुख-समृद्धि बनी रहेगी।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
एक दंत दयावंत, चार भुजाधारी
माथे पे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
हार चढ़ै, फूल चढ़ै और चढ़ै मेवा
लड्डुअन को भोग लगे, संत करे सेवा ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
दीनन की लाज राखो, शंभु सुतवारी
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
Disclaimer
इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।
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