
Kali Puja History: देश के ज्यादातर हिस्सों में दिवाली के दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसी रात मां काली की आराधना का विशेष महत्व है। यहां दिवाली को सिर्फ रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि मां काली की भक्ति और शक्ति की उपासना के रूप में भी मनाया जाता है। आखिर बंगाल में दिवाली के दिन मां काली की पूजा क्यों होती है? इसके पीछे की धार्मिक मान्यता और ऐतिहासिक परंपरा क्या है? जानिए
बंगाल में दिवाली के दिन होने वाली इस पूजा को काली पूजा या श्यामा पूजा कहा जाता है। यह कार्तिक महीने की अमावस्या को मनाई जाती है। यही वह रात होती है, जब देश के दूसरे हिस्सों में दिवाली के अवसर पर मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। बंगाल में मां काली को शक्ति, साहस और बुराई का नाश करने वाली देवी माना जाता है। भक्त उनसे जीवन की परेशानियों, नकारात्मक शक्तियों और बुरी परिस्थितियों से रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं। इस परंपरा की एक बड़ी वजह बंगाल में शाक्त परंपरा का गहरा प्रभाव है। शाक्त परंपरा में देवी को सर्वोच्च शक्ति और सृष्टि की मूल ऊर्जा माना जाता है। यही वजह है कि बंगाल में मां काली की भक्ति का विशेष स्थान है।
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बंगाल में मां काली की पूजा को लोकप्रिय बनाने का श्रेय 16वीं सदी के तांत्रिक विद्वान कृष्णानंद आगमवागीश को दिया जाता है। उनसे जुड़ी एक प्रसिद्ध मान्यता है कि मां काली ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए थे। हालांकि, इस कथा को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना नहीं माना जा सकता। बाद के दौर में बंगाल के राजाओं और जमींदारों ने भी काली पूजा को बढ़ावा दिया। धीरे-धीरे यह पूजा निजी धार्मिक अनुष्ठान से निकलकर बड़े सामुदायिक उत्सव का रूप लेने लगी।
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काली पूजा की रात बंगाल में मंदिरों, घरों और पूजा पंडालों को रोशनी से सजाया जाता है। मां काली की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और विशेष पूजा-अर्चना होती है। कई जगहों पर आधी रात के समय पूजा का विशेष महत्व रहता है। यही वजह है कि बंगाल में दिवाली का रंग थोड़ा अलग नजर आता है। जहां देश के कई हिस्सों में मां लक्ष्मी की आराधना प्रमुख होती है, वहीं बंगाल में मां काली की भक्ति इस पर्व को एक अलग पहचान देती है।
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