
उज्जैन. आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि यानी शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन (2 अक्टूबर, रविवार) देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है। देवी का यह रूप अत्यंत भयंकर है, जिसे देखते ही दैत्य भय से कांपने लगते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, देवी कालरात्रि की पूजा करने से शत्रुओं पर विजय मिलती है और हर तरह का दुख दूर होता है। 9 देवियों में देवी कालरात्रि का विशेष महत्व बताया गया है। आगे जानिए कैसा है देवी कालरात्रि का स्वरूप, इनकी पूजा विधि, कथा और आरती…
ऐसा है मां कालरात्रि का स्वरूप
मां कालरात्रि का स्वरूप बहुत ही भयंकर है। इनका रंग काला है और इनकी तीन आंखें हैं। इनके बाल बिखरे हैं और 4 भुजाएं हैं। इनका एक हाथ वर मुद्रा में और एक अभय मुद्रा में है। अन्य दो हाथों में हथियार हैं। इनका वाहन गधा है। गले में विद्युती जैसी चमकती हुई माला है। वाघम्बर इनका वस्त्र है। ये देवी युद्ध के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं।
2 अक्टूबर, रविवार के शुभ मुहूर्त (चौघड़िए के अनुसार)
सुबह 7:30 से 9:00 बजे तक- चर
सुबह 09:00 से 10:30 तक- लाभ
सुबह 10.30 से दोपहर 12.00 – अमृत
दोपहर 01.30 से 03:00 बजे तक- शुभ
इस विधि से करें देवी कालरात्रि की पूजा
- 2 अक्टूबर, रविवार की सुबह स्नान आदि करने के बाद देवी कालरात्रि की तस्वीर या प्रतिमा को पूजा स्थल पर स्थापित करें और श्रृंगार आदि करें।
- देवी कालरात्रि को कुमकुम, चावल, अबीर, गुलाल आदि चीजें चढ़ाएं। साथ ही मीठा पान भी अर्पित करें। सरसों के तेल का दीपक लगाएं।
- खास मनोकामना की पूर्ति के लिए 9 नींबूओं की माला बनाकर चढ़ाएं। देवी को गुड़ से बनी चीजों का भोग लगाएं और नीचे लिखे मंत्र का जाप करें-
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥
मां कालरात्रि की आरती
कालरात्रि जय-जय-महाकाली। काल के मुंह से बचाने वाली॥
दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा। महाचंडी तेरा अवतार॥
पृथ्वी और आकाश पे सारा। महाकाली है तेरा पसारा॥
खडग खप्पर रखने वाली। दुष्टों का लहू चखने वाली॥
कलकत्ता स्थान तुम्हारा। सब जगह देखूं तेरा नजारा॥
सभी देवता सब नर-नारी। गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥
रक्तदंता और अन्नपूर्णा। कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥
ना कोई चिंता रहे बीमारी। ना कोई गम ना संकट भारी॥
उस पर कभी कष्ट ना आवें। महाकाली माँ जिसे बचाबे॥
तू भी भक्त प्रेम से कह। कालरात्रि माँ तेरी जय॥
देवी कालरात्रि की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज अत्यंत पराक्रमी थे। जब इनता आतंक काफी बढ़ गया तो देवी पार्वती ने दुर्गा के रूप में अवतार लिया और दैत्यों से युद्ध करने लगी। इसी रूप में देवी ने शुंभ-निशुंभ का वध किया, लेकिन रक्तबीज का रक्त जहां-जहां गिरता, वहां लाखों रक्तबीज पैदा हो जाते। तब देवी दुर्गा ने मां कालरात्रि के रूप में अवतार लिया और रक्तबीज का वध किया। रक्तबीज से शरीर से निकलने वाले रक्त को माता ने पी लिया।
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