
Mahendra Singh Dhoni: महेंद्र सिंह धोनी का नाम भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल कप्तानों में लिया जाता है। मैदान पर उनका शांत अंदाज, मुश्किल परिस्थितियों में सही फैसला लेने की क्षमता और युवा खिलाड़ियों पर भरोसा करने की आदत उन्हें बाकी कप्तानों से अलग बनाती थी। धोनी ने न सिर्फ भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि झारखंड जैसे राज्य के खिलाड़ियों को भी बड़ा सपना देखने का भरोसा दिया।
15 अगस्त 2020 को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद धोनी भले ही भारतीय टीम से दूर हो गए हों, लेकिन झारखंड क्रिकेट पर उनका प्रभाव आज भी साफ दिखाई देता है। वह झारखंड से भारतीय सीनियर टीम तक पहुंचने वाले पहले बड़े क्रिकेटर थे। उनके बाद राज्य के खिलाड़ियों में यह विश्वास पैदा हुआ कि छोटे शहर और राज्य से निकलकर भी भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े मंच तक पहुंचा जा सकता है।
इसका ताजा उदाहरण दिलीप ट्रॉफी में ईस्ट जोन की खिताबी जीत में देखने को मिला। टीम में झारखंड के कई खिलाड़ी अहम भूमिका में नजर आए। कप्तान ईशान किशन के साथ शिखर मोहन, कुमार कुशाग्र, मोहम्मद कौनैन कुरैशी और अनुकूल रॉय जैसे खिलाड़ियों ने अपने प्रदर्शन से झारखंड क्रिकेट की मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई।
ईस्ट जोन की जीत में कप्तान ईशान किशन सबसे बड़े सितारे बनकर उभरे। उन्होंने फाइनल की पहली पारी में शानदार 270 रन बनाए और दूसरी पारी में भी तेजी से 80 रन जोड़े। दोनों पारियों में उनका कुल स्कोर 350 रन रहा।
ईशान की यह पारी सिर्फ आंकड़ों के लिहाज से खास नहीं थी, बल्कि उन्होंने टीम को मुश्किल स्थिति से निकालकर जीत की ओर ले जाने का काम भी किया। उनके प्रदर्शन में वही आक्रामकता और आत्मविश्वास दिखाई दिया, जिसकी झलक झारखंड के क्रिकेटरों में लंबे समय से देखने को मिल रही है।
युवा विकेटकीपर बल्लेबाज कुमार कुशाग्र ने भी फाइनल में अपनी छाप छोड़ी। उन्होंने पहली पारी में शानदार शतक लगाकर ईस्ट जोन के विशाल स्कोर की नींव मजबूत की। टीम ने पहली पारी में 708 रन का बड़ा स्कोर खड़ा किया, जिसमें झारखंड के बल्लेबाजों का योगदान बेहद अहम रहा।
वहीं, अपने पहले ही दिलीप ट्रॉफी मुकाबले में शिखर मोहन ने बिना दबाव के बल्लेबाजी करते हुए 85 रन की पारी खेली। इससे साफ हुआ कि झारखंड की अगली पीढ़ी बड़े मंच पर खुद को साबित करने के लिए तैयार है।
युवा ऑलराउंडर अनुकूल रॉय ने भी फाइनल में मुश्किल हालात के बीच महत्वपूर्ण पारी खेली। उंगली में चोट के बावजूद उन्होंने दूसरी पारी में 64 रन बनाए। उन्होंने मोहम्मद कौनैन कुरैशी के साथ सातवें विकेट के लिए 150 रन की अहम साझेदारी की, जिसने टीम को मुकाबले में मजबूत स्थिति दी।
ईस्ट जोन की इस जीत में बंगाल के अनुभवी तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी और बिहार के युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी जैसे खिलाड़ियों का योगदान भी अहम रहा। लेकिन झारखंड के खिलाड़ियों की सामूहिक मौजूदगी ने इस जीत को और खास बना दिया।
धोनी का जुड़ाव झारखंड क्रिकेट से अब भी बना हुआ है। जब भी वह रांची में होते हैं, झारखंड क्रिकेट एसोसिएशन के मैदान पर खिलाड़ियों से मिलने पहुंचते हैं। जूनियर हों या सीनियर, पुरुष टीम हो या महिला टीम, वह खिलाड़ियों के साथ समय बिताने और उन्हें सलाह देने से पीछे नहीं हटते।
झारखंड क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव और पूर्व भारतीय क्रिकेटर सौरभ तिवारी के मुताबिक, झारखंड की टीम के खिलाड़ियों पर धोनी की नजर बनी रहती है। वह जूनियर और सीनियर टीम के खिलाड़ियों के बारे में जानकारी रखते हैं और कई बार पूरी प्लेइंग इलेवन तक याद से बता देते हैं।
झारखंड अंडर-23 टीम के कोच इशांक जग्गी भी धोनी के प्रभाव को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके मुताबिक, झारखंड से भारतीय टीम तक पहुंचने वाले पहले खिलाड़ी धोनी थे और आज भी वह राज्य के क्रिकेटरों के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शक हैं।
धोनी जब रांची के मैदान पर पहुंचते हैं तो खिलाड़ियों की भीड़ उन्हें घेर लेती है। वह खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें खेल से जुड़ी जरूरी बातें भी बताते हैं। यही छोटी-छोटी मुलाकातें युवा क्रिकेटरों के आत्मविश्वास को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं।
ईशान किशन की कप्तानी में ईस्ट जोन की दिलीप ट्रॉफी जीत सिर्फ एक घरेलू खिताब नहीं है। यह उस बदलाव की तस्वीर भी है, जिसकी शुरुआत झारखंड से धोनी के भारतीय क्रिकेट में पहुंचने के बाद हुई थी।
धोनी ने झारखंड के खिलाड़ियों को यह भरोसा दिया कि बड़े सपने देखने के लिए महान क्रिकेटिंग शहर से आना जरूरी नहीं है। आज ईशान किशन, कुमार कुशाग्र, अनुकूल रॉय और दूसरे युवा खिलाड़ी उसी भरोसे को आगे बढ़ा रहे हैं। झारखंड का क्रिकेट अब सिर्फ धोनी की कहानी नहीं है, बल्कि धोनी से प्रेरित होकर तैयार हुई एक पूरी नई पीढ़ी की कहानी बन चुका है।