न था पीने का साफ पानी न ही बिजली, झुग्गी में रहने वाला बच्चा कैसे बन गया राष्ट्रीय खिलाड़ी

Published : Sep 05, 2019, 02:40 PM ISTUpdated : Sep 05, 2019, 06:04 PM IST
न था पीने का साफ पानी न ही बिजली, झुग्गी में रहने वाला बच्चा कैसे बन गया राष्ट्रीय खिलाड़ी

सार

राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी देवेंद्र वाल्मीकि का एक फेसबुक पोस्ट वायरल हो रहा है। पोस्ट को 'ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे' ने शेयर किया है, जिसमें उनके संघर्षों और हॉकी खिलाड़ी बनने की कहानी बताई गई है। पोस्ट में देवेंद्र वाल्मीकि अपने बचपन के बारे में बताया है, जब वह अपने परिवार के साथ मुंबई में एक झुग्गी में रहते थे। उन्होंने बताया, "मेरे माता-पिता अच्छी जिंदगी के लिए गांव से मुंबई आ गए। हमने स्लम में एक 10 बाई 10 का घर किराए पर लिया।"  

खेल डेस्क. राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी देवेंद्र वाल्मीकि का एक फेसबुक पोस्ट वायरल हो रहा है। पोस्ट को 'ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे' ने शेयर किया है, जिसमें उनके संघर्षों और हॉकी खिलाड़ी बनने की कहानी बताई गई है। पोस्ट में देवेंद्र वाल्मीकि अपने बचपन के बारे में बताया है, जब वह अपने परिवार के साथ मुंबई में एक झुग्गी में रहते थे। उन्होंने बताया, "मेरे माता-पिता अच्छी जिंदगी के लिए गांव से मुंबई आ गए। हमने स्लम में एक 10 बाई 10 का घर किराए पर लिया।"

न ही पीने के लिए साफ पानी था न ही बिजली

- उन्होंने लिखा, न ही हमारे पास पीने के लिए साफ पानी था और न ही बिजली। पढ़ने के लिए स्ट्रीट लाइट का इस्तेमाल किया और कभी-कभी भी बिना खाए सो जाते थे। मेरा परिवार 40 साल तक बिना बिजली के रहा।

कैसे आया जीवन में बदलाव?

- उन्होंने बताया कि इस खेल ने उनके जीवन को कैसे बदल दिया। "जब मैं 9 वीं कक्षा में था, मेरे भाई ने स्कूल में हॉकी खेलना शुरू कर दिया था। मुझे इस खेल के बारे में कुछ पता नहीं था। एक बार मैंने हॉकी खेलने का फैसला किया। अपने भाई (युवराज वाल्मीकि, अब एक राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी है) को देखते हुए मैंने सीखा। 

- "मैं हर दिन प्रैक्टिस करता था। जब मैं मैदान पर था तो इस बात की चिंता नहीं होती थी कि कौन हूं, कहां से आया हूं और मेरी परिस्थितियाँ क्या है।" कड़ी मेहनत का फल तब मिला, जब मुझे अंडर 18 की नेशनल टीम में चुना गया। 

- "मैंने अपने दिल और आत्मा को खेल में लगा दिया। मैंने पैसा कमाने के लिए क्लबों में खेला। कई मैच टीवी पर भी आए, लेकिन घर में टीवी नहीं होने की वजह से मां-पिता को पड़ोसियों के घर जाना पड़ता था।" इसलिए मैंने फैसला किया कि अगर मैं कभी भी ओलंपिक में देश के लिए खेलता हूं, तो मुझे अपने माता-पिता को बिजली का कनेक्शन और एक बड़ा टीवी मिलेगा। ताकि वे अपने बेटे को गर्व से खेलते हुए देख सकें। 

- देवेन्द्र का सपना तब पूरा हुआ जब उन्हें रियो ओलंपिक 2016 में खेलने के लिए चुना गया। हालांकि उस वक्त मुझे कंधे में चोट लगी थी। मैंने अपनी बचत से माता-पिता को एक टी वी खरीदा।

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