
रायपुर। बस्तर की पहचान मानी जाने वाली पारंपरिक पेय “सल्फी” को अब नई वैज्ञानिक सोच और आधुनिक तकनीक के जरिए स्वास्थ्यवर्धक पेय के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। इस दिशा में युवा नवाचारक हर्षवर्धन बाजपेयी महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित “इनोवेशन महाकुंभ 1.0” में उनके इस अनोखे प्रयोग को खास सराहना मिली। उनके नवाचार को “न्यू इनोवेशन अवार्ड” में तृतीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
हर्षवर्धन 'बस्तर इंडिजीनियस नेक्टर एग्रीकल्चर्स' के माध्यम से सल्फी पेय की सेल्फ लाइफ बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य सल्फी के प्राकृतिक स्वाद और उसके पोषक गुणों को लंबे समय तक सुरक्षित रखना है। वे चाहते हैं कि सल्फी केवल एक पारंपरिक पेय तक सीमित न रहे, बल्कि एक स्वास्थ्यवर्धक प्राकृतिक ड्रिंक के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाए।
हर्षवर्धन ने बताया कि सल्फी का रस पेड़ से निकालने के कुछ समय बाद ही प्राकृतिक रूप से किण्वित यानी फरमेंट होना शुरू हो जाता है। इसी वजह से यह धीरे-धीरे हल्का मादक पेय बन जाता है। यही कारण है कि सल्फी को लंबे समय तक सुरक्षित रखना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। अपने वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से हर्षवर्धन ने इस फरमेंटेशन प्रक्रिया की अवधि को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है। इससे सल्फी की मूल गुणवत्ता, स्वाद और पोषक तत्वों को अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकेगा।
सल्फी बस्तर की आदिवासी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्थानीय लोग इसे “बस्तर बीयर” के नाम से भी जानते हैं। यह कैरियोटा यूरेन्स (Caryota urens) नामक ताड़ प्रजाति के पेड़ से निकलने वाला मीठा रस होता है। ताजा सल्फी का स्वाद नारियल पानी की तरह मीठा और ताजगीभरा होता है। हालांकि कुछ घंटों बाद इसमें प्राकृतिक खमीर बनने लगता है, जिससे यह हल्का नशीला हो जाता है।
ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में सल्फी का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व काफी अधिक है। विवाह, पारंपरिक त्योहारों और सामाजिक आयोजनों में इसे विशेष रूप से परोसा जाता है। कई ग्रामीण परिवारों की आजीविका भी सल्फी पर निर्भर करती है। स्थानीय लोग इसे पेट संबंधी समस्याओं में भी लाभकारी मानते हैं।
हर्षवर्धन बाजपेयी का सपना है कि बस्तर की इस पारंपरिक पेय को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिले। वे चाहते हैं कि सल्फी को एक स्वास्थ्यवर्धक प्राकृतिक पेय के रूप में प्रचारित किया जाए। उनका लक्ष्य भविष्य में सल्फी को बस्तर के लिए जीआई टैग दिलाना भी है। उनका मानना है कि यदि सल्फी की गुणवत्ता और उपयोगिता को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित किया जाए, तो यह बस्तर के आदिवासी उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने का मजबूत माध्यम बन सकती है।
सल्फी पर हो रहा यह नवाचार बस्तर की स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। यदि इसकी सेल्फ लाइफ बढ़ाने में सफलता मिलती है, तो इसे बड़े बाजारों तक पहुंचाना आसान होगा। इससे स्थानीय उत्पादों की मांग बढ़ेगी और ग्रामीणों को रोजगार एवं आय के नए अवसर मिल सकेंगे। यह पहल बस्तर की पारंपरिक पहचान को आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए स्थानीय संस्कृति और अर्थव्यवस्था दोनों को मजबूत करने का काम कर रही है।
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